ग़ज़ल
के चलो उम्र का आइना तोड़ दें
जो जहां है उसे अब वहीं छोड़ दें।
मन के छालों को अब तक सहेजा मगर
मन करता है जानिब इन्हें फोड़ दे।
फिर वही दर्द फिर वो ही जज़्बात हैं
आओ इसमें नई एक कड़ी जोड़ दें।
थक के हम रुक गए थे सफर छोड़कर
अब यह सोचा है खुद को नहीं दौड़ दे।
रो के गुज़री या हंसकर मुझे ग़म नहीं
फिर आज से जिंदगी को नया मोड़ दें।
— पावनी दिक्षित जानिब
