दुनिया नहीं खुद को बदलो
ऐ पुरूष नहीं चाहिए मुझे
तुम्हारी संपत्ति
मगर हां परंपरा और संस्कृति के नाम पर
अपने सम्मान से सौदा
बिल्कुल नहीं करूंगी,
चाहे बिखर जाये
तुम्हारे बनाये एकपक्षीय ताने बाने,
कितनों भी दोष दे अपने या बेगाने,
धीर धरे रहना,
सब्र करना,
या सब कुछ नियति का खेल
सिर्फ मेरे लिये ही क्यों,
बता क्या बेड़ियों में जकड़ रखने के लिए
दुनिया भर के नियम,
आस्था,कर्मकांड,पाखंड
और हां अशिक्षा की बेड़ियां,
चोंचले दिखाने के लिए कहते रहते हो हमें
देवियां आधी आबादी,
मेरे लिए क्या जरूरी नहीं है मेरी आजादी,
क्या और क्यों तुम्हें पसंद नहीं
मेरा कदम से कदम मिला चलना,
खुले में खिलखिलाकर हंसना,
क्यों साबित करने लग जाते हो मुझे
असभ्य,बदचलन या कुल्टा,
बंधनवीर तुम्हारा कार्य है बिल्कुल उल्टा,
पाबंदी लगाने लग जाते हो मेरे लिबास पर,
थोड़ी हमदर्दी या हया कब लाओगे
हमें देखने के अंदाज पर,
सुधारो अपनी दोगली व्यवस्था,
अब नहीं अपना सकती समझौते वाली अवस्था।
— राजेन्द्र लाहिरी
