नारी की पीड़ा
आखिर मैं ही क्यों
दबी कुचली रहुँ इस समाज में
क्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं ?
आखिर मैं ही क्यों
अपनी पीड़ा को अंतर मन में रखूँ
क्या मेरी संवेदनाओ का कोई वजूद नहीं?
आखिर मैं ही क्यों
कुंठित व्यक्तित्व झेलू लोगों का
क्या मेरी भावनाओं का कोई मूल्य नहीं?
आखिर मैं ही क्यों
जियों ओर लोगों के लिए
क्या मेरे जीवन की कोई ‘हस्ती’ नहीं?
आखिर मैं ही क्यों
दिन-रात उत्पीड़ना सहन करुँ
क्या मुझे स्वयं खुश रहने का अधिकार नहीं?
— डॉ. राजीव डोगरा
