मुक्तक/दोहा

मुक्तक

जिन गलियों में बचपन बीता, उनकी बात निराली है,
लुकाछिपी आइस पाइस, खेलों की बात निराली है।
सारा गाँव एक हवेली, सबसे रिश्ते नाते होते,
रिश्तों में अपनापन गहराता, गाँव की बात निराली है।

आज तलक भी वह रिश्ते नाते, सारे हमको याद हैं,
घेर वाली नानी के घर, मक्खन की बात निराली है।
झोटा बुग्गी साही सवारी, कभी ऊँट गाड़ी होती थी,
रोज़ खेत जा रहट पर नहाना, यादों में बात निराली है।

आओ हम गाँव चलें, बरगद की ठाँव चलें।
चौपाल में जाकर बैठें, बैलों के साथ चलें।
बुजुर्गों की बात सुनें, नया तजुर्बा वहाँ चुनें,
संस्कार वहाँ मिलते, आओ हम गाँव चलें।

चौपाल में खाटें बिछती, मूढे मूढी साथ में सजती,
गली गाँव के सारे झगडे, समस्याओं पर राय बनती।
फसल कौनसी किस मौसम में, कैसे पैदावार बढे,
समृद्ध गाँव स्वस्थ रहें जन, पशुओं की चर्चाएँ चलती।

हम सब खेत खलिहान चलें, मेढ मचान चलें
रहट का गीत सुनें हम, आओ सब गाँव चले।
गाँव होता एक हवेली, रिश्ते नाते सखी सहेली,
सबको अपनी ठाँव मिले, आओ सब गाँव चलें।

आज भी चूल्हा जलता है, रिश्तों में प्यार छलकता है,
मक्का रोटी- साग हांडी का, आओ सब गाँव चलें।
दही छाछ मक्खन की मौजें, उरद की दाल को घोटें,
हारे का दूध हो और ताजा गुड, आओ हम गाँव चलें।

राम राम सब करते, खेत में काम सब करते,
नीम छाँव तले खटिया, पुरखों के गाँव चलें।
पक्षियों का कलरव होता रोज़ ही उत्सव होता,
नफरत छोड गले मिलें, आओ सब गाँव चलें।

नहीं पता जाति धर्म क्या, भेद अमीरी का न जाना,
प्यार भरा सब रिश्तों में, रिश्तों की बात निराली है।
सम्मान बड़ों का होता, जात पात की बात नहीं है,
गाँव में मेहमान सभी का, मान की बात निराली है।

— डॉ अ. कीर्तिवर्द्धन

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