लघुकथा

कौन अपना?

“मम्मी, ये कुछ पुरानी साड़ियाँ हैं ।तुम्हारी बहू की हैं ।वो अब इसे नहीं पहनती ।ये पुराने फैशन की हो गई है हां पर बहुत महंगी हैं ।इसे आप पहन लेना।आपको तो पता ही है कि आपकी बहू को पुराने फैशन के कपड़े बिल्कुल पसन्द नहीं है।हाँ परसों की मिठाई रखी है ।आपकी बहू को अच्छी नहीं लगी ।आपके लिए लाया हूँ।खा लेना।”
बेटे ने माँ से कहा।
तभी तीज में आई हुई बेटी बाजार से लौटी और सुंदर -सुंदर साड़ियां देखकर खुश होते हुए बोली-“अरे वाह!भइया ने आपके लिए तीज की साड़ी भी खरीद दिया ।बहुत ही सुंदर हैं।”
यह सुनकर माँ ने उदास होते हुए कहा-“नहीं बिटिया यह साड़ियां पुरानी हैं।तेरी भाभी की उतरन है ।अब यह मुझे मिली है।”
“कोई बात नहीं मम्मी, आप दिल छोटा न करें ।अभी भी आपकी बेटी अपनी ही है ।देखो मैं बाजार से आपके लिए तीज की साड़ी लाई हूँ।आप न मत करना ।मैं जानती हूं कि अब आपके पीहर में कोई नहीं है ।यह साड़ी पीहर की भेंट मानकर स्वीकार कर लेना।बेटियाँ भी तो एक समय बाद माँ का रूप बन जाती हैं न।” यह कहते हुए बेटी मुस्कुराने लगी।
माँ ने रुंधे गले से कहा-“हां बिटिया, जिन बेटियों को हम पराया समझ कर दूसरों के घर बिदा कर देते हैं । वे पराया होकर भी अपना होती हैं और जिन बेटों को हम अपना समझकर लाड़ प्यार करते हैं वे शादी के बाद सचमुच पराया हो जाते हैं।”
बेटी प्रत्युत्तर में दूर बैठे अपने भाई को देखने लगी जो मोबाइल में आँखें गड़ाए हुए था।
— डॉ. शैल चन्द्रा

*डॉ. शैल चन्द्रा

सम्प्रति प्राचार्य, शासकीय उच्च माध्यमिक शाला, टांगापानी, तहसील-नगरी, छत्तीसगढ़ रावण भाठा, नगरी जिला- धमतरी छत्तीसगढ़ मो नम्बर-9977834645 email- shall.chandra17@gmail.com