कविता

खामोशी

यह कैसी ख़ामोशी है
एक अजीब तरह की
ख़ामोशी है
आंधी तूफान आने से
पहले की ख़ामोशी है ।
लगता है
ज़मीं पर आसमान आने से
पहले ही ख़ामोशी है ।।

माना शहरों में सन्नाटा पसरा है !
माना गांव में मातम पसरा है !!
परंतु..,
इन प्राकृतिक वातावरण में
इस तरह की मौनता क्यों है ?

हवाओं में सनसनाहट नहीं
चिड़ियों में चहचहाहट नहीं
नदियों में गति नहीं
झरणों में धार नहीं
लताओं में हरियाली नहीं
बारिशों में खुशहाली नहीं

समस्त प्राकृतिक
वातावरण ही मौन है
स्तब्ध है
रुक सा गया है
थम सा गया है

लगता है
त्रिनेत्र खुलने वाला है
त्रिलोकी आने वाले हैं

लगता है
धरती पर भगवान आने से
पहले की ख़ामोशी है ।

लगता है
जमीन पर आसमान आने से
पहले की ख़ामोशी है ।।

— मनोज शाह ‘मानस’

मनोज शाह 'मानस'

सुदर्शन पार्क , मोती नगर , नई दिल्ली-110015 मो. नं.- +91 7982510985

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