गीतिका/ग़ज़ल

तुम हो

दिवार पर कागा बोले तो लगता है कि तुम हो,
आहट सी कोई आये तो लगता है कि तुम हो।
इस कदर तेरी चाहत, दिलों दिमाग पर छायी,
दिखती जो कहीं परछाई, लगता है कि तुम हो।
लाल साड़ी में लिपटी मचलती नदी सी वो दिखी,
जुल्फ लहरायी जो उसने, लगता है कि तुम हो।
घने कोहरे के बीच सूरज की किरण सी चमकी,
सर्दी की धूप का अहसास, लगता है कि तुम हो।

— अ. कीर्तिवर्धन