कविता
जब तक स्वार्थ हैं,
लोग खड़े साथ हैं।
आजमा लेना तुम,
फिर कह देना तुम,
हाथ को धोते हाथ हैं।
झूठा है भाईचारा,
झूठा है प्यार सारा,
रिश्ते सारे अनाथ हैं।
सब कोरा दिखावा,
कर रहे हैं छलावा,
झुके सबके माथ हैं।
लिख रहा “विकास”
टूट गयी सब आस,
छलनी हुआ गाथ है।
— डॉ. विकास
