कुण्डलिया छंद
माया को जग पूजता, वैभव का गुणगान।
रिश्ते फीके से लगे, निर्धन का अपमान।।
निर्धन का अपमान, लड़े भाई-भाई से।
खींचातानी शोर, होड़ बेपर्वाई से।।
नेह बिना परिवार, नहीं हैं शीतल छाया।
खोया हैं अब प्यार, ढूँढता ममता माया।।
माया को जग पूजता, वैभव का गुणगान।
रिश्ते फीके से लगे, निर्धन का अपमान।।
निर्धन का अपमान, लड़े भाई-भाई से।
खींचातानी शोर, होड़ बेपर्वाई से।।
नेह बिना परिवार, नहीं हैं शीतल छाया।
खोया हैं अब प्यार, ढूँढता ममता माया।।