कुण्डली/छंद

कुण्डलिया छंद

माया को जग पूजता, वैभव का गुणगान।

रिश्ते फीके से लगे, निर्धन का अपमान।।

निर्धन का अपमान, लड़े भाई-भाई से।

खींचातानी शोर, होड़ बेपर्वाई से।।

नेह बिना परिवार, नहीं हैं शीतल छाया।

खोया हैं अब प्यार, ढूँढता ममता माया।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८