खामोशी की ओर
कदम खुदबखुद जा रहा है लेके मुझे
अनंत खामोशी की ओर,
अब नहीं रहा मेरा मुझ पर जोर,
शरीर,वक्त,संबंध सभी
मुंह फेर ले रहा है मुझे देखकर,
किसी से नजरें नहीं मिला पा रहा हूं झेंपकर,
कुछ पैसे कमाने का बन गया हूं मशीन,
हूं बेरंग पर दिख रहा हूं रंगीन,
बच्चे मुंह बनाने लगे हैं मुझे देखते,
गुस्से में हैं रह रह सामानों को फेंकते,
कुछ कुछ दबाव मुझे दबा रहा है,
साथ का व्यवहार मुझे झुका रहा है,
न चाह कर भी चला जा रहा हूं मदहोशी की ओर,
कदम खुदबखुद जा रहा है लेके मुझे
अनंत खामोशी की ओर,
समय कम है और करने की तमन्ना है बहुत कुछ,
प्रगति चाहिए छोड़ शुभ अशुभ,
पता नहीं निरा मूर्ख हूं या सीधा सादा,
धोखा ही मिला जब किया भरोसा ज्यादा,
कोई आंखें तरेर रहा कोई मुंह फुला रहा,
हर कोई रह रह मुझे मेरा हश्र दिखा रहा,
अब तो मेरे लिए न दिन न रात न शाम न भोर,
कदम खुदबखुद जा रहा लेके मुझे
अनंत खामोशी की ओर,
अनंत खामोशी की ओर।
— राजेन्द्र लाहिरी
