पुस्तक समीक्षा : देर आयद दुरुस्त आयद

कहते हैं कला किसी को विरासत में मिलती है तो किसी को ईश्वरीय प्रदत्त गुण मिलता है। कला के जरिए इंसान अपनी भावनाओं को सहज एवं सरल तरीके से व्यक्त कर सकता है। कला की अभिव्यक्ति के कई तरीके होते हैं जैसे कोई चित्रकार चित्रों के जरिए खुद को दर्शाता है, कोई संगीत में पारंगत होकर तो कोई लेखक अपनी कलम के जादू से लोगों को आकर्षित करता है। इसी तरह कलाकार कई विधाओं में पारंगत होकर अपनी कलाओं का प्रदर्शन करते हैं। ऐसे ही कलाकार साथी है हमारे महाराष्ट्र के नागपुर से माननीय किशोर दीपचंद लालवानी जी! किशोर भाई के लिए जहां तक मैंने उनको जाना है तो इतना ही कहूंगी कि यह गुण शायद उनके रक्त में ही समाया है तभी इतनी कम उम्र में महज 20 वर्ष की आयु से वे सिंधी एवं हिंदी लेखन कार्य और अदाकारी में अपना सिक्का जमा हुए हैं। चूंकि महाराष्ट्र से वास्ता रखते हैं तो मराठी भाषा पर भी उनकी पकड़ बहुत मजबूत है और कुछ मराठी नाटकों का अनुवाद भी इन्होंने किया है।
बात करते हैं उनके बाल एकांकियों के संग्रह ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ की। इस एकांकी संग्रह में चार छोटी-छोटी नाटिकाओं का समावेश है। इसमें पहले नंबर पर ‘भविष्यवाणी’ नाम से एकांकी है। इस एकांकी के माध्यम से एक रिटायर्ड दुकानदार मोहनदास, उनकी पत्नी विमला देवी और उनके युवा होते पुत्र सोनू के ऊपर केंद्रित है। एक मध्यम वर्गीय परिवार में जैसे कि सब की सोच होती है कि बच्चा बड़ा होते ही पिता के काम में सहयोग करें ताकि आमदनी का कोई जरिया बना रहे। पर इस एकांकी में सोनू का जो किरदार है वह व्यवसाय से ज्यादा खिलाड़ी बनने की ओर अग्रसर है। सोनू को क्रिकेट खेलने का बेहद शौक है। इसी शौक के चलते वह पढ़ाई के साथ-साथ खुद को निखारने का प्रयत्न भी करता रहता है परंतु पिता मोहनदास को उसका यह प्रयास बिल्कुल भी नहीं सुहाता है लिहाजा पति-पत्नी में सोनू को लेकर अनबन जारी है। एक दिन पिता सोनू को बुरी तरह लताड़ता है और आखिर हालात से तंग होकर सोनू क्रिकेट की प्रैक्टिस छोड़कर उनके कहे अनुसार व्यवसाय में आने को राज़ी हो जाता है। इस पर सोनू का जो कोच था वह उनके घर आता है और हस्तक्षेप करके सोनू के मम्मी पापा को समझता है और इस बात के लिए राजी कर देता है कि अगर वह पढ़ाई के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भी अच्छा कर रहा है तो आपको उसका सहयोग करना चाहिए। वैसे भी बच्चों पर अपनी राय थोपने ने से पहले बच्चे की किस विषय में या किस खेल में रुचि है इस पर भी ध्यान देना बहुत जरूरी है। यहां पर किशोर लालवानी जी आज के हालातों को मद्देनज़र रखते हुए यह संदेश भी इस एकांकी के जरिए दे रहे हैं कि ठीक है,पढ़ाई अपनी जगह पर सही है और उसकी जो वैल्यू है वह रहेगी इसके साथ ही अगर कोई बच्चा किसी खेल में पारंगत है तो उसे कम नहीं आंका जा सकता है। बेहतरीन संदेश के साथ इस एकांकी का सकारात्मक अंत होता है।
बात करें इस एकांकी संग्रह के दूसरे नाटक की तो यहां मैं किशोर लालवानी जी से अपनी कलम के जरिए करना चाहूंगी कि आपने इतिहास के पन्नों को खंगाल कर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर एकांकी बनाकर हमारी आने वाली पीढ़ी को न सिर्फ अपनी जड़ों से जोड़ा है वरन् एक बेहतरीन प्रयास द्वारा इसको पेश भी किया है। सिंध के अंतिम शासक वीर सम्राट दाहिर सेन की शहादत और उनकी दोनों बेटियों की वीरता का किस्सा बखूबी वर्णन किया गया है। इस नाटक की दूसरी खासियत यह है कि इस नाटक में एलईडी स्क्रीन पर चलती तस्वीरों के साथ सूत्रधारों की जो आवाज आती है वह एक नई तकनीक का बेहतरीन प्रयोग है, जो नाटकों को बेहद मजबूती प्रदान करेगा और इस प्रयोग का उन्होंने बेहतरीन तरीके से प्रयोग किया है, जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। अवाम तक यह संदेश जरूर पहुंचेगा कि हमारे सिंध का इतिहास कितना गौरवशाली है और ऐसी पहल लेखकों को करते रहनी चाहिए।
बात करें इस एकांकी संग्रह के तीसरे क्रम पर जो नाटक है ‘वरिष्ठ जन हमारे समाज की धरोहर है।’ इस नाटक में किशोर लालवानी जी ने परिवारों में बुजुर्गों की घटती अहमियत पर जोर दिया है। बुजुर्ग हमारे परिवार की धरोहर होते हैं। यहां पर दो किरदारों चंदू एवं विनोद,जो कि आपस में दोस्त भी हैं, द्वारा पूरे घटनाक्रम की रचना की गई है। चंदू एकल परिवार में रहने वाला बच्चा है जबकि विनोद का भरा पूरा परिवार है जिसमें माता-पिता के साथ दादा दादी भी हैं और उसकी परवरिश बेहतरीन तरीके से होती है। घटनाक्रम में कई जगह ऐसे मोड़ आ जाते हैं जब पढ़ने वाला या नाटक देखने वाला खुद को भावनात्मक रूप से कमज़ोर महसूस करता है और नम आंखों से विचार करने लगता है कि सचमुच घर के बुजुर्ग किसी वटवृक्ष की भांति है जैसे विनोद के दादाजी जब चंदू के पिताजी से वार्तालाप करते हैं तब संवाद हैं ‘हम सब बदल सकते हैं पर हमारे वरिष्ठ जनों को नहीं बदल सकते हैं। वह जो हैं जैसे हैं उन्हें इस रूप में स्वीकार करना होगा उन्हें छोड़ देंगे तो खुद अपनी जड़ों से कट जाएंगे। इतिहास के एहसास से कटा हुआ समाज ऐसे सूख जाता है जैसे अपनी जड़ों से कटकर पेड़ सूख जाए।
यह संवाद इतना जबरदस्त बन पड़ा है कि पढ़ने और मंचन के दौरान देखने वालों को भाव विभोर कर देता है। इसी संवाद के बाद आकाश का हृदय परिवर्तन हो जाता है और वह भी अपने बुजुर्ग माता-पिता को वापस अपने घर ले आता है।यह इस नाट्य एकांकी की सफलता का प्रतीक है।
बात करते हैं इस नाटक के अंतिम एकांकी की जिसका टाइटल है ‘देर आयत दुरुस्त आयद’ जो कि इस किताब का टाइटल भी है। मैं समझती हूं किशोर लालवानी जी समाज पर हो रही घटनाओं को पैनी और गहरी नज़र से देखकर उसे अपनी लेखनी में भी उतारते हैं। बिल्कुल ठीक उसी तरह ‘देर आयत दुरुस्त आयद’ नाटक में एक मध्यम वर्गीय परिवार जिसमें एक सरकारी ऑफीसर नारायण का किरदार है। उसकी धर्मपत्नी बीना है और उनका पुत्र अमन है। नारायण को अपने काम के सिलसिले में अक्सर बाहर जाना पड़ता है जिसकी वजह से घर की और बच्चे की जिम्मेदारी इस पर है। अमन पढ़ाई में होनहार और बुद्धिमान विद्यार्थी है। अचानक उसकी मुलाकात उसके दोस्त अनिल से होती है। अनिल के संपर्क में आने से अमन को ऑनलाइन गेम की लत लग जाती है जिसकी वजह से वह घर की जमा पूंजी और गहने गंवा देता है। जब माता पिता को इस बारे में जानकारी मिलती है तो उसे बहुत लताड़ लगाई जाती है। अमन आवेश में आकर आत्महत्या जैसा कदम उठाने को अग्रसर हो जाता है तभी उसको पढ़ाने वाले शिक्षक व्यास जी आगे आते हैं और उसको अच्छे बुरे की परख देते हैं। आखिर में अमन मम्मी पापा से माफी मांगता है और अनिल से दोस्ती खत्म कर देता है। इस तरह एकांकी का अंत दिखाया जाता है।
किशोर लालवानी जी समाज में व्याप्त बुराइयों और अन्य गतिविधियों पर बराबर नज़र रखे हुए हैं, इस एकांकी संग्रह में यह बात शिद्दत से महसूस होती है। चारों एकांकियों में एक सकारात्मक संदेश दिया गया है। नाट्îकला से जुड़े हुए लोग इसे अवश्य पढ़ें। मैं विनीता मोटलानी इस संग्रह हेतु शुभकामनाएं प्रेषित करती हूं।
पुस्तक का नाम – ‘देर आयत दुरुस्त आयद’
लेखक – किशोर लालवानी, नागपुर
प्रकाशक – लायंस पब्लिकेशन,ग्वालियर
समीक्षक – विनीता मोटलानी, इंदौर
