कविता

नशा

झूम रहा हूं मैं भी उसी नशे में
जिस नशे में झूम रहा मेरा समाज,
दुश्मनों ने सोचा था हमारा अंत न आगाज़,
कभी निकले थे मस्तिष्क में बिना बोझ लिए,
राहों में मिलते गये शत्रु जिन्होंने अपने लाभ खातिर
हमारा दिमाग खाली रखने की व्यवस्था दिये,
फिर हम चल पड़े उनके बताये रास्ते पर,
मन मस्तिष्क पर लाद लिए और
लेते रहे नाम दिन रात भोजन व नाश्ते पर,
फिर अपनी गाढ़ी कमाई उड़ेलते रहे,
खुद की भविष्य की परवाह न कर
चलते रहे खुदकुशी की राह बिना कहे,
पग पग,पल पल बंध चुके थे जीवन के,
संचेतना,संचार निकल चुके थे तन मन से,
निश्चेतना से बड़ी देर बाद जागा,
जिधर प्रकाश की किरण दिखी
अंधकार छोड़ मैं सरपट भागा,
अब मैंने अपना लिया है भयंकर लेकिन जरूरी नशा,
बंधुत्व,मानवता,संविधान और अम्बेडकर है लगा,
अब सब एक व समान नजर आते हैं,
जो समता-समानता की राह दिखाते हैं,
अब मैं इस नशे से दूर नहीं जा सकता,
महापुरुषों के समतावादी विचार और
तन मन में उत्साह जगाने वाला जय भीम के नशे को
कभी भुला नहीं सकता,कभी भुला नहीं सकता।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554