टूटना मत
पेड़ों की सूखी टहनियां चिपकी रहती हैं
पेड़ से,काली पड़ गईं हैं पर
छोड़ नहीं पाती हैं साथ पेड़ का
ठीक वैसे ही जैसे इंसान का
अतीत चिपका होता है,
उसके मन की परतों से
सूख कर कठोर हो जाने के बाद भी
अस्तित्व से चिपक जाता है लेकिन
पेड़ों पर नई कोंपलों का खिलना
रुक तो नहीं जाता,
नई- नई कोंपले बढ़ाती जाती हैं
उसकी ऊंचाई…..
और छुपा लेती हैं उस काले अतीत को
अपनी हरियाली में……
वो सूखी टहनी कड़ी और अड़ियल सी
चुभ जाती है पेड़ को कभी – कभी
लेकिन उसकी चुभन भी मीठी सी
लगने लगती है तब,जब याद आता है कि
कभी इस हद तक बेजान हो चुके हम
आज फिर हरे हो गए हैं और छू रहे हैं
नई ऊंचाई,बुझते – बुझते हम फिर से
जल उठे और मिली नई रंगीनियां,
लेकिन पेड़ की वो सूखी टहनी सूखी तो है
पर उतनी ही सच है जितनी,
ऊंचाई की तरफ लहराती हरी – भरी टहनियां
दोनों का होना ही हमारा होना है
इनमें से कोई एक न हो तो
संभव नहीं हमारा होना ,
इसलिए बसाए रहना अतीत को
मन के किसी कोने में,जिससे
याद रहे कि हम टूटे भी और सूखे भी
लेकिन टूटकर भी जुड़ने को बेताब रहे…
टूटना और जुड़ना ही सच कर देता है
जीने को,होने को और आगे बढ़ने को
सहना,रहना और कहना……..
बस टूटना मत कभी, टूटना मत…….
