सुनों गरीब की दहाड़
आकर गई हैं जनवरी आएगा अगस्त,
नहीं है कोई सुखी, नहीं है कोई मस्त।
क्यों? नहीं ये किसी का चेहरा खिला,
अपनों से महीनों-सालों में नहीं मिला।
ये मालिक तो बुलन्द;सेठ यहाँ हैं मस्त,
मज़दूर का पसीना शरीर यहाँ हैं पस्त।
शोषक है सुखी नोट गिनने में हैं व्यस्त,
उसी की है जनवरी उसका ही अगस्त।
महल हो रहें आबाद तो झोपड़ी उजाड़,
ग़रीब बस्ती में रोज़ होवें हैं घोड़ापछाड़।
जन-जन की पीठ पे हैं बजट का पहाड़,
बताओ कौन सुन रहा गरीब की दहाड़।
— संजय एम तराणेकर
