कविता

खो रही आनंद मुस्कान

जाति-पाति व धर्म के नाम पर लड़ाना कितना आसान,
कमजोर हुई भारत की रीढ़ खो रही “आनंद” मुस्कान ।

टूटा है आज भी संगठन उन्हीं षड्यंत्रकारी विवादों से,
मुकर जाते देशवासी सहज एक साथ चलने के वादों से,
इंसानियत शर्मसार कब मिटेंगे कलंकित लड़ाई झगड़ें,
ताक में बैठे हैं दुश्मन भावनाओं पर प्रहार करते तगड़े,
बाहर से हुआ विकास पर अंदर अव्यवस्थित सामान,
कमजोर हुई भारत की रीढ़ खो रही “आनंद” मुस्कान ।

अपना-अपना स्वार्थ आगे आता है हर मुद्दे में पहले,
उगलता है जन समुदाय शब्दों के भारी भरकम गोले,
कभी राजनीति की मार तो कभी भ्रष्टाचार अत्याचार,
सुर्खियों में होते तर्क वितर्क विरोध प्रदर्शन के समाचार,
अंतःकरण में बसा दर्द का सैलाब वो ही पुरानी दास्तान,
कमजोर हुई भारत की रीढ़ खो रही “आनंद” मुस्कान ।

स्वाधीनता का रंग भी नहीं दे सका अब तक समदृष्टि,
स्वयं कुछ परित्याग करने की सोच से हिल जाती सृष्टि,
भूचाल आ जाता है फिर बस देश में ये तेरा – ये मेरा,
खो जाता फिर कहीं आक्रोश में हर नया सुखद सवेरा,
रोज मिलते यहॉं अनगिनत दिलों में दर्द के गहरे निशान,
कमजोर हुई भारत की रीढ़ खो रही “आनंद” मुस्कान ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु