झुकना मेरी तहजीब है
झुका हुआ वृक्ष
फल से भरी डालियों में
आभार बोलता है
नदी का पानी
नीचे बहते हुए भी
समुद्र रचता है
माटी की खुशबू
पाँव छूकर सिखाती
नम्रता का अर्थ
दीपक की लौ
झुककर ही फैलाती
उजाले की सीमा
हवा का स्पर्श
धीमेपन में छुपा है
जीवन का संगीत
झुकी पलकों में
सम्मान की रोशनी
चुपचाप चमके
झुकना कमजोरी नहीं
संस्कार की पहचान
मेरी तहजीब है
— डॉ. अशोक
