परिपक्वता का सन्देश क्या है
ओस से भीगी सुबह,
काँपता पत्ता मुस्काए,
हवा थाम लेती है।
चुप्पी की गोद में,
शब्द अपने आप झुकें,
आँखें सच पढ़ लें।
कठोर धूप में भी,
छाया बाँटना सीखो,
यही बल की जड़।
करुणा की हथेली,
टूटे मन को सहलाए,
कमज़ोरी नहीं।
जो समझ सके दर्द,
वही ऊँचा उठता है,
मौन की शक्ति।
परिपक्व मन जाने,
क्षमा भी साहस है,
और प्रेम निर्णय।
— डॉ. अशोक
