प्राणों का मधुमास
धीरे-धीरे समझ रही हूॅं अब मैं हर एक श्र्वास,
बसा है जिनमें “आनंद” प्राणों का मधुमास ।
जन्म जन्मांतर की यात्रा अभी तक रही अधूरी,
गति दे रहा है परमात्मा ढूॅंढ रही हूॅं मैं कस्तूरी,
शनै: शनै: स्वीकार रही हूॅं मैं नए-नए परिवर्तन,
श्र्वासें ही श्रृंगारित सुरभित कर रही मेरा जीवन,
आ रहा है इस मार्ग पर चलना अब मुझे रास,
धीरे-धीरे समझ रही हूॅं अब मैं हर एक श्र्वास ।
छुपा है इनमें ही हर एक समस्या का समाधान,
अब तक थी भ्रमित मैं इस चमक से अंजान,
बाहर देख रही जो आनंद वो तो था अपूर्ण,
बसा भीतर अनंत सागर बना सके जो संपूर्ण,
समान रूप दिया सबको प्रभु ने खजाना खास,
धीरे-धीरे समझ रही हूॅं अब मैं हर एक श्र्वास ।
मौन का जादू और विचारों पर लगा हुआ विराम,
जैसे प्रभु की गोदी में सिर रख कर रही मैं आराम,
नहीं सताता अब भय ना रहा कोई भी अवसाद,
अद्भुत है परमेश्वर का दिया हुआ ये अमृत प्रसाद,
सब कुछ है मेरे भीतर हो गया मुझे यह विश्वास,
धीरे-धीरे समझ रही हूॅं अब मैं हर एक श्र्वास ।
— मोनिका डागा “आनंद”
