कहानी

कहानी – वह शहीद हो गया

सुबह सुबह के सूरज की अल्हड़ किरणें घर के छोटे से जँगले के किवाड़ की झीरी में से घर के भीतर आने को आतुर हो रही हो मानों ।
घर के भीतर की पीड़ा से भलीभांति परिचित जो थी,आखिर सूरज की किरणें कामयाब हो ही गयी ।
अम्मा के घर के भीतर झाँकने में क्योंकि सूरज की किरणें भी चाहती थीं उदासी की सीलन को कुछ पल के लिए ही सही कुछ तो कम कर पाए। ।
अम्मा एक छोटी बस्ती में रहती थी अपने छोटे से घर में और वह भी अपनी बहू कम्मो और अपने पोते के साथ।
पोते की मासूम और भोली सूरत और उसकी बाल लीलाएं भी अब तो अम्मा की दर्द और पीड़ा को कम करने में असफल थी।

कहते है न कि कुछ ज़ख्म ऐसे होते है जिन्हें भरने में समय भी असफल होता है क्योंकि कभी न भरने वाली पीड़ा जोक के जैसी अम्मा के जीवन को चिपट कर भीतर ही भीतर खाए जाती थी।
बस ,सबको बेफिक्री तो इस बात की थी कि अम्मां और उनकी बहू को भर पेट इज्जत की रोटी मिल जाती थी और तन ढकने भर कपड़ा नसीब हो ही जाता था।
एक बेटा था जो देश की रक्षा के लिए शहीद हो गया था।

हर महीने पेंशन मिलते हो अपनी अम्मा के अकाउंट में पैसे आजाएं करते थे ,अम्मा को पैसे को कोई खुशी ना होती थी बल्कि उसकी आँखें भर आती थी,जिन्हें वह अपनी बहू से छुपाकर अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछ लिया करती थी।
आखिर समय का चक्र उल्टा जो घूम रहा था।
जो दर्द अम्मा ने सहा जवानी में वही दर्द आज उसको लाडली बहू कम्मो भी झेल रही है।
परन्तु समय ने कम्मो को गंभीर बना दिया था जो रोटी नहीं थी कभी ,उसकी आंखों के आंसू सूख गए थे मानों।
आज भी जब अम्मा के अतीत में झांकती हूं तो कलेजा फटने को हो आता है।
जब अम्मा बड़ी खुश रहा करती थी। मुहल्ले भर के सुख दुख की साझीदार हुआ करती थी अम्मा।
देखते ही देखते सबकुछ बिखरता सा चला गया।
अम्मा के पति परलोक सिधारते ही ।
इस ज़ख्म को तो समय के में ने भर ही दिया था क्योंकि अब अम्मा का बेटा भी बड़ा हो गया था।
ईश्वर की कृपा से सुंदर,सुघड़ संस्कारी बहू थी जो आँगन में जब इधर-उधर चलती थी तो लगता था मानों साक्षात माँ लक्ष्मी हो।
बहू के पाँवों की पायल चलते-फिरते छनक-छनक कर घर के सूनेपन को हराने में आखिर सफल हो ही जाती थी।
उसकी चुड़ियों को खनखन सुनकर तो अम्मा अपनी कलाई का सुनापन भूल जाया करती थी।
अम्मा भी बहुत खुश थी ऐसी लक्ष्मी स्वरूपा बहू कम्मो को पाकर और हो भी क्यों ना बहू हर समय अम्मा की सेवा करने के लिए अम्मा के इर्द गिर्द ही तो घूमती फिरती रहती थी।क्योंकि वैसे भी दोनों सास बहू ही तो थी पूरे घर भर में।
अम्मा का पति तो जवानी में ही छोड़कर चला गया था अम्मा को। जैसे-तैसे अम्मा ने दिन रात मेहनत करके अपने इकलौते बेटे को पढा-लिखाकर इतना कामयाब तो कर ही दिया था कि उसकी सरकारी नौकरी भी लग गई थी।
पहले पहल तो अम्मा रोने लगी थी कि पति तो चला ही गया देश के लिए और अब बेटा भी देश की सेवा के खातिर मुझे छोड़कर चला जायेगा।
दिन रात अम्मा इसी चिंता में दुबली होने लगी ।
बस! एक दिन अम्मा बैठी थी इसी सोच में कि वह आखिर ऐसा क्या करे कि जो बेटे के नौकरी पर जाने के बाद उसका मन भी लग जाए और घर में भी उदासी अपने पांव ना पसार सके।
तभी अचानक से किसी ने अम्मा को आवाज लगाई।
“जोगिंदर की अम्मा अरी घर पर ही है क्या”
आवाज जानी पहचानी सी लग रही थी ।
अम्मा अपने विचारों की दुनिया से झट से बाहर आई और उठकर किवाड़ खोलते हुए बड़बड़ाई।
“अरे कौन होगा..?
तभी किवाड़ खुलते ही अपने सामने अपने मामा के साले के बेटे धर्मपाल को देखकर अम्मा बच्चों के जैसी खुश होते हुए कहने लगी।
“अरे धर्मा तू ?.. तू यहां कैसे और इतने सालों बाद तुझे मेरी याद कैसे आ ग़ई”?
धर्मा ने अम्मा के बराबर से निकलर आंगन में पड़े तख्त पर बैठते हुए अम्मा की तरफ देखकर हंसते हुए कहा।
“अरे सांस तो लेने दे चौधरन ” कहकर धर्मा जोर से हंस पड़ा अब अम्मा ने उसके पास बैठते हुए हैरानी से अपनी आँखें फैलाते हुए उसकी तरफ देखकर कहा।
“चौधरन ? तू नशे में तो ना कहीं रे धर्मा? “
“अरे कैसी बात करती है तू जोगिंदर की अम्मा?देख ज्यादा घुमा फिराकर तो मुझे बात करनी नहीं आती है तो सीधा सीधा बोल देता हूं मैं तेरे बेटे जोगिंदर का ब्याह अपनी बेटी कम्मो से करवाना चाहता हूं।”
धर्मा ने बिना किसी लाग लपेट के अपनी बात का दी।
बस फिर तो अम्मा बिना उसकी बात का उत्तर दिए सीधी रसोई घर में गई और एक कटोरे में गुड रखकर ले आई।
“ले मुंह मीठा कर ले तूने तो अचानक से आकर मेरी सारी दुविधा ही दूर कर दी र धर्मा”..
मैं तो आधी हो गई सोच सोच के जब से जोगिंदर की नौकरी की बात सुनी।
बस!अब तू तो घर जाके बारात के स्वागत की तैयारी कर धर्मा ।”

अम्मा दो चार रिश्तेदारों को ले जाकर जोगिंदर के फेर फेर कर कम्मो को बहू बनाकर घर ले आयी ।
अब तो जोगिंदर को तीन महीने बाद ड्यूटी पर जाना था।
बहू के घर में आगमन से तो मानों खुशियों की बरसात ही होने लगी थी।
कुल मिलाकर दिन अच्छे बीत रहे थे।
तब अम्मा की खुशी का और भी ठिकाना न रहा जब उसे पता चला कि उसकी बहू कम्मो मां बनने वाली है।
अब तो अम्मा उसे पलकों पे बिठाकर रखती थी।
अचानक से जोगिंदर को भी बुलावा आ गया और वह हंसी खुशी जल्दी ही नन्हें मेहमान के आने से पहले ही आने के वादे के साथ देश की रक्षा के लिए चला गया।
कम्मो को कभी खाने-पीने की कोई कमी नहीं रखती थी अम्मा किन्तु इधर कुछ दिनों से अम्मा की तबियत भी ठीक ना थी।
बस इसी कारण वें अक्सर अपनी पड़ोसन रोशनी को ही बुला लिया करती थी रात में बहू के पास सोने के लिये।

आज दिन में अम्मा की हालत भी ठीक थी और वह जब रोशनी को बुलाकर लायी थी तो घर आते ही ब्याही गाने लगी थी यूँ ही बैठकर।
“जच्चा झुक-झुक देखे पलना।
तू चाँद जैसा किस पे हुआ मेरे ललना”
अचानक ही अम्मा खड़ी होकर नाचने लगी और गीत गाने लगी।
“सासू मांगे हैं नेग पलंग की बिछाई ।
सासू मांगे हैं नेग पलंग की बिछाई।
कमरे में से जच्चा कहे ,पिया मेरे परदेश माई।”

तभी अम्मा को ऐसे गाते नाचते
देखा रोशनी ने..तो वह देखती ही रह गई।
” अरे वाह जोगिंदर की अम्मा तू तो अभी से ब्याही गाने लगी।?”

“नजर मत ना लगाइए रोशनी ,खुशी के दिन तो अब ही आये हैं जीवन में।”
परन्तु ये खुशी भी ज्यादा दिन की नहीं थी समय के गर्भ में क्या छुपा है ये तो कोई नहीं जानता सिवाय भगवान के।
अचानक बहू के कूलने की आवाज़ रोशनी के कानों में पड़ी उसकी नींद खुल गयी और उसने देखा बहू तो प्रसव पीड़ा के मारे बेहाल हुई जा रही हैं वह झट से अम्मा के पास गई
“अम्मा तनिक देखो तो बहू मारे दर्द के मछली के जैसी तड़प रही है…. ओ अम्मा कित्ती गहरी नींद
में सोई है…” ।
अम्मा को जगाने गयी रोशनी अम्मा के ना जागने की वजह से खुद में बड़बड़ाती हुई अम्मा की चारपाई के पास जाकर खुद में ही बड़बड़ाने लगी” लगता है अम्मा गधे-घोड़े सब बेचकर सोई है।”
रोशनी की आवाज सुनकर अम्मा हड़बड़ा कर उठ गई ।
“अम्मा बहू दर्द से तड़प रही है और तू है कि कोई खबर हो नहीं इसी गहरी नींद में कोई सोता है भला?”
“अरे सवेरे सवेरे मरा बहुत बुरा सपना दिखा रहा था तो आंख न खुली”

सवेरा अपना पूरा आकार ले चुका था रोशनी ने झट से दूसरे पड़ोसी के घर का दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया।
सारी बात जानकर एक के बाद एक गांव वाले इकठ्ठे हो गये।
तभी एक पड़ोसी अपने रेडे पर बहू को लिटाकर रोशनी को साथ ले पास के सरकारी अस्पताल में लेकर चला गया।
अम्मा भी बहू के साथ अस्पताल जाने की जिद करने लगी।
तभी अम्मा को पड़ोस के ही एक परिवार ने घर में बैठाकर बताया कि तेरा जोगिंदर आने वाला है तो तू कैसे जा सकती है अस्पताल जोगिंदर की अम्मा और फिर वहां तो है ना दो तीन जाने बहू की देखभाल को।
अम्मा खुश होते कहने लगी “चलो अच्छा मेरा जोगिंदर भी आते हो अपने बच्चे को गोद में लेकर खिला लेगा।”
तभी पड़ोसन की रुलाई फूट पड़ी और वह रोते हुए बोली।
धीरज ना खोइए जोगिंदर की अम्मा जो कह रहे हैं ध्यान से सुन ।
तेरा जोगिंदर आ तो रहा है पर वह ..वह तिरंगे झंडे में लिपटा हुआ आ रहा है।
वह शहीद हो गया जोगिंदर की अम्मा तेरा बेटा शहीद हो गया।।

— डॉ. सविता वर्मा ‘ग़ज़ल’

सविता वर्मा "ग़ज़ल"

जन्म- १ जुलाई पति का नाम - श्री कृष्ण गोपाल वर्मा। पिता का नाम-स्व.बाबू राम वर्मा । माता का नाम-स्व.प्रेमवती वर्मा । जन्म स्थान- कस्बा छपार , मुज़फ्फर नगर (उप) शिक्षा- आई.टी,ई, कहानी-लेखन डिप्लोमा । प्रकाशन- क्षेत्रीय , अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओ में । प्रसारण- आकाशवाणी के अनेक केन्द्रों से रचनाएँ प्रसारित । लेखन विधा-कविता,कहानी,गीत,बाल साहित्य,नाटक,लघु कथा, ग़ज़ल,वार्ता, हाइकु,आदि ।। पुरस्कार,सम्मान- वीरांगना सावित्री बाई फुले फैलोशिप सम्मान-2003 देहली। * महाशक्ति सिद्धपीठ शुक्रताल सम्मान-2004। *लघु कथा पुरस्कार सामाजिक आक्रोश -2005 सहारनपुर। *शारदा साहित्य संस्था जोगीवाला राजस्थान द्वारा हिंदी साहित्य सम्मान-2004 । *भारती ज्योति मानद उपाधि -2007 इलाहाबाद । *नेशनल फेडरेशन ऑफ ब्लाइंड देहली द्वारा समाज सेवा हेतु -2008 । *भारती भूषण सम्मान-2008 इलाहाबाद । *विनर ऑफ़ रेडियो क्विज़ ” दिल से दिल तक ” 20012 । *कहानी "नई दिशा" को "डा.कुमुद टीक्कु" प्रथम पुरस्कार -2014 अम्बाला छावनी। *गुगनराम एजुकेशन एन्ड सोशल वेल्फेयर सोसायटी बोहल द्वारा पुस्तक “पीड़ा अंतर्मन की” पुरस्कृत -2014 । *आगमन एक खूबसूरत प्रयास द्वारा सम्मान-2014 । *उत्कृष्ट साहित्य एवम् काव्य भूषण सम्मान-2015 खतौली। *नगर पालिका मुज़फ्फर नगर द्वारा सम्मान-2015 *साहित्य गौरव सम्मान ,नई दिल्ली -2015 ! *राष्ट्रीय गौरव सम्मान-लखनऊ-2015 ! *कस्तूरी कंचन सम्मान-नोयडा-2015 ! *लघु कथा "कमला"वूमेन एक्सप्रेस" द्वारा सम्मानित ! *सामाजिक संस्था “प्रयत्न” द्वारा “नारी शक्ति रत्न” सम्मान 2015 । *“आगमन साहित्यिक एवम् सांस्कृतिक संस्था द्वारा “विशिष्ठ अतिथि सम्मान” 2015 । *"आगमन गौरव सम्मान-2016 *"साहित्य कुमदिनी सम्मान" 2017 (गज केसरी युग,गाजियाबाद द्वारा ) *"आगमन तेजस्वीनी सम्मान-2018 ! "श्रीमती सरबती देवी गिरधारीलाल साहित्य सम्मान-2019 (गुगनराम एजुकेशन एण्ड सोशल वेलफेयर सोसायटी बौहल हरियाणा द्वारा ) *विशेष—नारी सशक्तिकरण पर बनी फ़िल्म “शक्ति हूँ मैं” में अहम भूमिका। *पुस्तक- “पीड़ा अंतर्मन की” प्रकाशन-2012। *संपादन- काव्य शाला (काव्य सन्ग्रह), "कस्तूरी कंचन " काव्य संग्रह ! अहसास (ग़ज़ल संग्रह) , समर्पण-5(काव्य संग्रह)। “श्रोता सरगम” वार्षिक पत्रिका। "भाव कलश" काव्य संग्रह । सम्बन्ध- “प्रयत्न” सामाजिक संस्था मुजफ्फरनगर सदस्य॥ “अखिल भारतीय कवियित्री सम्मेलन " आजीवन सम्मानित सदस्या । "वाणी" एवम "समर्पण" साहित्य संस्था ( मुजफ्फरनगर )सहित अनेक सहित्य संस्थाओं की सदस्या । सम्पर्क- सविता वर्मा "ग़ज़ल" श्री कृष्ण गोपाल वर्मा , 230,कृष्णापुरी , मुज़फ्फर नगर,पिन-251001 (उप्र) ई मेल -savita.gazal@gmail.com मोबाइल-08755315155