कविता

गूंगे सिखा रहे हैं हमें, कितना बोलना चाहिए

खामोशी में बैठे, सब नियम बताते हैं,
सच छुपाने को ही धर्म बतलाते हैं।
जो अपनी आवाज़ खो चुके, वही हुक्म लगाते हैं,
ऐसे हुक्म, हुकरामानो को अब मरोड़ना चाहिए।
गूंगे सिखा रहे हैं हमें, कितना बोलना चाहिए।

मुंह खोलो तो दोष लगाते हैं,
चुप रहो तो तारीफ़ मिलाते हैं।
जो डरते नहीं, वही समाज को सजाते हैं,
सच और झूठ को अब तोलना चाहिए।
गूंगे सिखा रहे हैं हमें, कितना बोलना चाहिए।

सिखाने वाले न्यायाधीश कहलाते हैं,
हम बस दर्शक, सब कुछ सह जाते हैं।
हर खामोशी में खतरा छुपा दिखाते हैं,
हर खतरे के निशान को तोड़ना चाहिए।
गूंगे सिखा रहे हैं हमें, कितना बोलना चाहिए।

हम भी तो आवाज़ अपनी उठाएंगे,
दिल की सुनेंगे, सच की राह अपनाएंगे।
डरेंगे नहीं झूठी तानाशाही को झुकायेंगे,
स्वाभिमान को आगे पीछे नहीं डोलना चाहिए।
गूंगे सिखा रहे हैं हमें, कितना बोलना चाहिए।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh