मुक्तक
बाद मुद्दतों के दिल की खिड़की पर आहट हुई,
जमाने की इस भीड़ में मुझे तेरी ही चाहत हुई।
ना जाने कितने चेहरे गुजरे नजरों के सामने से,
तुझे देख दिल के जख्मों में महसूस राहत हुई।
दिल ने कहा तुम ही हो, जिसकी तलाश थी,
इस जन्म की नहीं, ये जन्मों की प्यास थी।
देखकर तुझे धड़कनों में हलचल सी मची,
जिस शाम देखा तुझे, शाम बेहद खास थी।
मेरी सुबह तुमसे हो औऱ रात तुम पर ठहरे,
दोनों साथ बैठकर देखें चंद सपने सुनहरे।
न फलक चाहिए, न चाहिए जमीन मुझको,
अब दिन ब दिन होते जाएं जज्बात ये गहरे।
“विकास” के लिए चाँदनी की चमक हो तुम,
महके जिससे घर आँगन वो महक हो तुम।
औरों से झूठे वादे करने आते नहीं मुझको,
बावरे दिल की धड़कनों की धमक हो तुम।
— डॉ. विकास शर्मा
