गीत/नवगीत

फाल्गुनी बहार है

प्रकृति ने किया श्रृंगार आई फाल्गुनी बहार है,
जीवन में खिले फिर इंद्रधनुषी रंग बेशुमार है ।

मुस्कुराने लगी है कलियॉं भवरें डोल रहे,
कानों में प्रीत के गीत धीरे से जो बोल रहे,
स्वच्छंद हुआ आकाश पक्षियों ने उड़ान भरी,
सूरज की रश्मि रथियों ने स्वर्णिम आभा करी,
तेज चली मदमस्त पवन “आनंद” पारावार है।

तन्हाई का मौसम बीता प्रीत ऋतु मन भाएं,
आहट कर चुपके से दिलों में प्यार को जगाएं,
आए दिन सुहाने धरती ने ओढ़ ली चूनर धानी,
सजने लगे नयनों में फिर से सपने आसमानी,
बूझते जीवन में चैतन्य हुआ प्रीत का निखार है ।

पुरवाई बह रही आम मंजरी सुगंध बिखराएं,
तन-मन को पुलकित कर गीत गाएं दिशाएं,
पलाश ने छिटक लालिमा छटा अद्भुत बिखेरी,
लद्द गई बौरों से नीम आमों की लताएं घनेरी,
आस करें जीवन में सदा प्राणों का संचार है ।

प्रकृति ने किया श्रृंगार आई फाल्गुनी बहार है,
जीवन में खिले फिर इंद्रधनुषी रंग बेशुमार है ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु