ग़ज़ल
राह में देखना भरे पड़े शूल हैं सब।
समझकर इन्हें चलो यहाँ तो फूल हैं सब ।।
यूँ कभी रुसवा यहाँ कोई नहीं होता।
समझते दूजों को ही यहीं धूल हैं सब।।
आएँ दौर कैसे भी अब गुज़रो तुम तो।
चलो तुम मानकर कि ये फ़िज़ूल हैं सब।।
राज़ हर दौर के अब सुनो खोलो तुम ही।
न हों जो काम के तो कहना धूल हैं सब।।
दंगाई फिरते सभी इधर-उधर रहते।
सोच लो अब इसी फ़साद की मूल हैं सब।।
कर्म करने की तो बात ही दूर होती।
( ज़िंदगी पास करने में मशगूल हैं सब। )
मान लो तुम कि कुछ तो नियम होते ही हैं।
कोई मान ले तो पक्के उसूल हैं सब।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
