अफसरों की शहादत का शोर?
आज का सिनेमा युद्ध, शहादत व सेना केंद्रित,
कहानियाँ पूरी तरह होना चाहिए थी विकेंद्रित।
देशभक्ति के नाम पर बन रही फिल्मों का शोर,
उस असली सैनिक की आवाज़ पहुँचे चहूँओर।
सीमा पर खड़ा होकर लड़ता रहता हैं सिपाही,
बॉर्डर की ज़मीं 1-1 इंच की रक्षा देता गवाही।
माना हर पात्र के साथ न्याय करना संभव नहीं,
लेकिन उसे क्रेडिट तो बड़े पर्दे पर दो हर कहीं।
अब कहानी कहने के तरीके चाहे बदल गये हो,
‘चरित्र-चित्रण’ में लेखक-निर्देशक का न्याय हो।
सैनिकों की बहादुरी में न हो अफसरों का शोर?
उनकी शहादतों के साथ न हो अन्याय घनघोर।
— संजय एम तराणेकर
