मानसिक स्वास्थ्य अधिक जरूरी
‘‘स्वस्थ मस्तिष्क में स्वस्थ तन का वास होता है।’’ महान् यूनानी दार्शनिक अरस्तु द्वारा यह कथन शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक क्षमता में गहरे सम्बन्ध को दर्शाता है। प्राणी स्वस्थ कैसे रह सकता है? इसके जवाब में यहीं कहा जा सकता है कि जब शरीर, मन, इन्द्रियाँ एवं आत्मा एक साथ कदम-से-कदम मिलाकर सन्तुलन से कार्य करते हैं, तब ही अच्छा स्वास्थ्य कहलाता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि- ‘‘क्या स्वस्थ रहने के लिए मानसिक स्वस्थता का होना अधिक आवश्यक है?’’ हाँ, शारीरिक स्वास्थ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण है मानसिक स्वास्थ्य का होना। मानसिक स्वास्थ्य का अच्छा होना ही हमें जीवन में आने वाली चुनौतियों, तनाव और अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए सक्षम बनाता है। प्राणी के जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण को बनाए रखने में मानसिक स्वास्थ्य बहुत सहायक होता है। यदि मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, तो प्राणी में चिड़चिड़ापन, निराशा, नींद की कमी या तनाव जैसी समस्याएँ दिखाई देने लगती हैं। इसलिए हमारे बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक जीवन में आने वाले प्रत्येक चरण में मानसिक स्वास्थ्य महत्त्वपूर्ण है।
आजकल यह देखने में आता है कि हर कोई व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत ही जागरूक होता नज़र आ रहा है। वह अपने खान-पान, दिनचर्या एवं कार्यशैली पर अत्यधिक ध्यान देने लगा है। विशेषकर आजकल का युवा, जो अपने स्वास्थ्य को लेकर अधिक जागरूक है। यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन इनमें से कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते है जो अपने शारीरिक रोगों अथवा उनसे होने वाली परेशानियों को लेकर जरूरत से ज्यादा दुःखी अथवा परेशान रहते हैं। रोगों से होने वाली परेशानियों से उनका स्वभाव अक्सर चिड़चिड़ा हो जाता है। रोग भले छोटा ही क्यूँ न हो फिर भी उसे लेकर वह अत्यधिक तनाव में रहते हैं। रोग या व्याधि के समय में उनके परेशान रहने का एक और मुख्य कारण है उनके आसपास का वातावरण एवं वे लोग जो बार-बार उन्हें रोगी होने का एहसास करवाते है और न चाहते हुए भी फिजूल के मशवरे देकर रोगी को और अधिक परेशान करते हैं।
किसी भी प्रकार के रोग से ग्रस्त लोगों से मैं यही कहना चाहूँगा कि आप रोग को अपने मन-मस्तिष्क पर हावी न होने दें तथा आसपास के लोगों के व्यर्थ के सुझावों पर बिल्कुल भी ध्यान न दें। सिर्फ यहीं चिन्तन करें कि आपको यह रोग हुआ कैसे है? कहीं इसका जिम्मेदार आपका गलत खान-पान, आपकी दिनचर्या अथवा कार्यक्षेत्र में अत्यधिक कार्य से होने वाला तनाव तो नहीं है।
हाँ, एक बात और है कि अच्छे स्वास्थ्य एवं समृद्धि पर ग्रह-नक्षत्रों का भी प्रभाव पड़ता है। हमारे नक्षत्र (समय) यदि विपरीत चल रहे हो तो न तो स्वास्थ्य अच्छा रहेगा और न ही जीवन में समृद्धि का संचार होगा। दूसरी और हमारे शास्त्रों में भी लिखा हुआ है और संतजनों के प्रवचनों में भी अक्सर सुनाई देता है कि अच्छा स्वास्थ्य एवं समृद्धि तो कर्म प्रधान होती है। हमें अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति एवं धैर्यतापूर्वक शारीरिक रोगों एवं उससे होने वाली परेशानियों का सामना करना है। रोग तो जीवन में आते-जाते रहेंगे। हमें अपना संयम नहीं खोना है।
अभी कुछ दिन पूर्व मैंने यू-ट्यूब पर एक विडियों देखा। जिसमें एक साहब बता रहे थे कि आपकी समृद्धि एवं स्वस्थता स्वच्छ कपड़ों से ही झलकती है। अच्छे एवं साफ कपड़े पहनने से आपके चारों और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। उन साहब की बात से मैं तो क्या आप भी सहमत नहीं होंगे।
हमारे जीवन में मानसिक स्वस्थता कितनी आवश्यक है यह दुनिया भर में ऐसे कई लोगों के जीवन को देखते हुए मिल जायेंगे। जिन्होंने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, संयम और मेहनत से असाध्य रोग होते हुए भी अपने-अपने क्षेत्र में विजय पाई हैं, जिनमें से इग्लैण्ड में जन्में एवं लकवे जैसे असाध्य रोग से ग्रस्त विश्व प्रसिद्ध भौतिक और ब्रह्माण्ड वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग एवं केरल के वायनाड जिले की शेरिन शाहना जिन्होंने व्हीलचेयर पर रहते हुए संग लोक सेवा आयोग ;न्च्ैब्द्ध परीक्षा पास की, हरियाणा के करनाल जिले की प्रीति बेनीवाल ने रेल दुर्घटना में घायल होने तथा अनेकों सर्जरी होने के बावजूद भी वह आई.ए.एस. ;प्।ैद्ध बनी। ऐसे उदाहरण साबित करते हैं कि दृढ़ इच्छाशक्ति, संयम एवं मेहनत से किसी भी शारीरिक बाधाओं को पार किया जा सकता है।
— राजीव नेपालिया (माथुर)
