कविता

अविचल प्रहार

गरज उठा रण भैरव नभ में,
धरती ने हुंकार भरी,
शौर्य सूर्य फिर उग आया,
भुजाओं में ज्वाला धरी।

टकरा जाए पर्वत भी यदि,
पथ से न हटेगा चरण,
वज्र हृदय, दृग में दिप्त ज्वाला,
हाथों में तेजस्वी करण।

रुधिर-रंजित हो वसन भले ही,
मन में भय का नाम नहीं,
जननी-भूमि की रक्षा हेतु
जीवन भी अब मोह नहीं।

सिंह नाद कर आगे बढ़ते,
विप्लव की ज्वाला संग लिए,
विजय ध्वजा ऊँची लहराए,
प्रतिज्ञा दृढ़ अंग-अंग लिये।

जो गिरा, उठा फिर मुस्काया
“रण ही मेरा उत्सव है!”
मातृभूमि के चरणों पर ही
अर्पित मेरा सर्वस्व है।

वीर वही जो संकट में भी
अडिग, अचल, अविचल रहे,
वज्र-सा अडिग संकल्प लिये
इतिहासों में अमर रहे।

— डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’

डॉ. सारिका ठाकुर "जागृति"

ग्वालियर (म.प्र)