मैं खेत की मेड़ हूँ
माटी की रेखा
चुपचाप खड़ी हूँ
सीमाओं के बीच
धूप सहती हूँ
बरसात पीती हूँ
ऋतुओं की सखी
बीजों की आशा
मेरे संग पलती
हरियाली हँसे
किसान के पग
मुझ पर चलते हैं
थकान बिसरती
झगड़ों की रेखा
फिर भी जोड़ती हूँ
दिलों की दूरी
पगडंडी बनकर
रास्ता दिखाती
सन्नाटा सुनती
हवा के संग मैं
धीरे गुनगुनाती
धरती की कथा
— डॉ. अशोक
