घनिष्ठता की सुध
क्यों? याद आते हैं उन्हें ‘हमेशा’ सिर्फ़ हक़,
मुश्किल में पालक दिल नहीं जाता धड़क।
सिर्फ लेना ही लेना क्योंकर उन्हें हैं सूझता,
कुछ ‘देने’ हेतू मन कभी क्यों न पसिजता।
हाल-चाल भले बुरे ना हो ‘पूछ’ लिया करो,
तुम रिश्तों के घनिष्ठता की सुध लिया करों।
क्या? हमने ही ‘बिसारने का प्रण’ लिया हैं,
वहीं गडे मुर्दे उखाड़ने का ‘निश्चय’ किया हैं।
तुम्हारी गलतियों को नजरअंदाज किया है,
कभी-कभी हमने खून का घूंट भी पिया है।
यूं हक़ जमाना ‘पालकों के मन’ में ठिकाना,
पहले उनकी करिए सेवा बाद में मुस्कुराना।
— संजय एम तराणेकर
