पता नहीं यह क्या है
वही पुराने धोखे हैं या
कोई संकट नया है,
पता नहीं यह क्या है,
हम आ जाते हैं धोखे में छलने वालों के,
साधारण सी जिंदगी से जलने वालों के,
बकबक पर आँखें बिछाए हुए हैं,
उल्टे सीधे नियम चलाए हुए हैं,
मरते रहेंगे हम तो ये पानी न पिलाए,
उम्मीद करें कैसे अपने घर ये खिलाएं,
थोथे जात के नाम पर ये बने बैठे हैं उच्च,
अलग है क्या बताएं हाड़,मांस और पित्त,
व्यवहार इनका दिखलाता है ये लुच्चे और तुच्छ,
बिखरे हैं हम और रहते ये गुच्छ,
भ्रम की बातों में ये हमको फंसाया
नहीं बात कोई नया है,
पता नहीं यह क्या है,
दिखाई हमको ख्वाब और ऊंचे ऊंचे सपने,
नरम व्यवहार से हम मान लेते अपने,
एक हाथ खंजर और एक हाथ तलवार है,
सामने से नहीं यह करते छुपके वार है,
मस्तिष्क में हमारे वो बैठा है कब्जा करके,
कुछ कर नहीं पाते रहते हम हाथ धर के,
करके अपराध हो बैठा रहता शांत,
क्यों नहीं समझ पाते वो है सदा आक्रांत,
सब कुछ कर जाने की
क्या छूट उन्हें सदा है,
पता नहीं यह क्या है,
पता नहीं यह क्या है।
— राजेन्द्र लाहिरी
