मुक्तक/दोहा

खुशियां भी भरपूर

कीर्ति जिसकी फैलती रमेश चारों ओर
उनके खिलाफ ना मचे कोई सा भी शोर

करता जो भी आदमी परिश्रम ही भरपूर
उसके आंगन से भगे सदा अंधेरा दूर

धन को ही बल समझता धन है उसकी जान
वो किसी से रखें नहीं कोई भी पहचान

दुःख से जीवन बीत रहा होरी है बेहाल
होगा इक दिन देखना जीवन भी खुशहाल

देते हो यदि आप तो दूजों को जब पीर
वो खींचेगी आपकी इज्ज़त का ही चीर

दुःख जितने तुझको मिले उनसे मत हो दूर
मिलेगी तुझे बाद में खुशियां भी भरपूर

महाभारत मचा हुआ घर-घर में श्रीमान
रिश्ते सारे हो गये रमेश लहूलुहान

होगा जगत में उसका रमेश नाम महान
बिकने ना देगा कभी अपना वो ईमान

जग में जब चलने लगा रमेश उनका नाम
तब वे लगाने लगते खुद ही अपना दाम

करते हैं जो भी यहां काम अपना निष्काम
मिलता है उनको सदा नफरत देख तमाम

— रमेश मनोहरा

रमेश मनोहरा

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