गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

तेरे क़दमों पे सर झुका रक्खें
तुझको अपना ही हम बना रक्खें।

बेवफाई तिरी तो जानते थे हम
ख़ुद को हम फिर भी बा-वफा रक्खें।

आह भी निकलेगी तो भला कैसे
दिल में जब तुझको हम बसा रक्खें।

तेरे ख़त को जलाएं कैसे हम
याद में इनको जब सजा रक्खें।

मेरी आंखों में अब नहीं आंसू
दर्द सीने में ही दबा रक्खें।

मुझको भाती है ये जुदाई भी
इस जुदाई से दिल लगा रक्खें।

मीरा वैसे भी तो दिवानी है
ज़हर होठों पर क्या लगा रक्खें।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com