ग़ज़ल
चोट लगती है जिगर पर हम लिखा करते हैं।
हर अदा से आप से हम तो वफ़ा करते हैं।
हो गये हो आप जो मशहूर मेरे दम से,
मिल गई ताकत उसी से तुम जफ़ा करते हैं।
गम मिला हम को तभी से गमजदा बन बैठे,
ख़त लिखे थे शौक से उस की दवा करते हैं।
छोड़ कर जाना मुनासिब है लगा यह आप को,
खुश रहो तुम ज़िंदगी में हम दुआ करते हैं।
कौन बनता है गमी में सोचता हूॅं अक्सर,
अश्क मेरे नैन के साथी बना करते हैं।
— शिव सन्याल
