लघुकथा

लघुकथा : अखबार की पीढ़ी

हवाई जहाज़ अपनी ऊँचाई पर स्थिर था। यात्रियों की दुनिया मोबाइल स्क्रीन में सिमटी हुई थी। कोई वीडियो देख रहा था, कोई यूँ ही स्क्रीन स्क्रोल कर रहा था। उसी बीच मेरी नज़र पास बैठे एक सज्जन पर ठहर गई। उम्र से अनुभवी, व्यक्तित्व से गंभीर पूरे सफ़र में वे शांति से अख़बार पढ़ते रहे। वह पेशे से किसी अदालत के न्यायाधीश थे।
अख़बार की सरसराहट मुझे किसी और समय में ले जा रही थी। मन में सहज जिज्ञासा जागी। मैंने विनम्रता से पूछा, “सर, क्या आज भी अख़बारों पर भरोसा किया जा सकता है? क्या इनमें वही पत्रकारिता बची है, जो कभी हुआ करती थी?”
उन्होंने अख़बार मोड़ा, चश्मा उतारा और मुस्कुराते हुए बोले, “मेरी नज़र में पत्रकारिता का स्तर चाहे जितना गिर जाए, लेकिन यही पन्ने और यही स्याही उसे थामे हुए हैं। गिरते समय को संभालने का काम आज भी ये काले अक्षर ही कर रहे हैं।”
उनकी बात में विश्वास था, अनुभव था।
मैंने उत्सुकतावश फिर पूछा, “तो क्या आप टीवी नहीं देखते?”
इस बार उनकी मुस्कान और गहरी हो गई। बोले, “टीवी को किसी ने ‘इडियट बॉक्स’ यूँ ही नहीं कहा। वह है भी… और बनाता भी है।”
इतना कहकर वे फिर अख़बार में डूब गए। मैं चुप रहा क्योंकि लगा, उन्होंने सिर्फ़ मीडिया पर नहीं, हमारी सोच पर भी टिप्पणी कर दी है।

— रवि शुक्ला, अबु धाबी (यूएई)

रवि शुक्ला

रवि रमाशंकर शुक्ल ‘प्रहृष्ट’ शिक्षा: बी.ए वसंतराव नाईक शासकीय कला व समाज विज्ञानं संस्था, नागपुर एम.ए. (हिंदी) स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्व विद्यालय, नागपुर बी.एड. जगत प्रकाश अध्यापक(बी.एड.) महाविद्यालय, नागपुर सम्प्रति: हिंदी अध्यापन कार्य दिल्ली पब्लिक स्कूल, नासिक(महाराष्ट्र) पूर्व हिंदी अध्यापक - सारस्वत पब्लिक स्कूल & कनिष्ठ महाविद्यालय, सावनेर, नागपुर पूर्व अंशदायी व्याख्याता – राजकुमार केवलरमानी कन्या महाविद्यालय, नागपुर सम्मान: डॉ.बी.आर.अम्बेडकर राष्ट्रीय सम्मान पदक(२०१३), नई दिल्ली. ज्योतिबा फुले शिक्षक सम्मान(२०१५), नई दिल्ली. पुरस्कार: उत्कृष्ट राष्ट्रीय बाल नाट्य लेखन और दिग्दर्शन, पुरस्कार,राउरकेला, उड़ीसा. राष्ट्रीय, राज्य, जिल्हा व शहर स्तर पर वाद-विवाद, परिसंवाद व वक्तृत्व स्पर्धा में ५०० से अधिक पुरस्कार. पत्राचार: रवि शुक्ल c/o श्री नरेन्द्र पांडेय पता रखना है अन्दर का ही भ्रमणध्वनि: 8446036580