ग़ज़ल
मन कितना लाचार लगे है
जब सब कुछ व्यापार लगे है
है कीमत हर एक रिश्ते की
दुनिया इक बाजार लगे है
जब अपना साया बैरी हो
तब जीना दुश्वार लगे है
आँखों पे मज़हब का पर्दा
ये कोई आज़ार लगे है
मैं कैसे गुलशन में जाऊँ
हर इक गुल जब खार लगे है
किससे मन की पीर बताऊँ
सारा जग बीमार लगे है
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
