इतना सन्नाटा पसरा हुआ है क्यों
चुप गलियां हैं
हवा भी थमी सी
कुछ तो हुआ
सूनी राहें
कदमों की आहट
कहाँ खो गई
खिड़की उदास
परदे भी चुप हैं
किसका इंतज़ार
बुझते दिए
रोशनी सहमी सी
रात गहरी
मन में सवाल
खामोशी कहती
राज़ पुराने
बिखरी धूप
छाँव भी चुपचाप
कुछ अनकहा
वीरान दिल
धड़कन भी धीमी
सुनता कौन
इतना सन्नाटा
क्यों पसरा है यूँ
जवाब कहीं
— डॉ. अशोक
