राजनीति

देश के विकास में सबसे बड़ा बाधक है भ्रष्टाचार

भारत एक ऐसा देश है जिसने हजारों वर्षों की सभ्यता और संस्कृति को अपने भीतर समेटा है। यह वही धरती है जहाँ ‘सत्यमेव जयते’ को राष्ट्रीय आदर्श वाक्य के रूप में अपनाया गया। लेकिन स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी, इस राष्ट्र की प्रगति की गाथा में एक काला अध्याय लगातार जोड़ा जाता रहा है — और वह है भ्रष्टाचार। यह केवल किसी एक विभाग या व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि एक ऐसी महामारी बन चुकी है जो राष्ट्र की जड़ों को भीतर से खोखला करती जा रही है।

भ्रष्टाचार का अर्थ है सत्ता, पद या संसाधनों का व्यक्तिगत लाभ के लिए दुरुपयोग। यह घूसखोरी से लेकर सरकारी धन के गबन तक, भाई-भतीजावाद से लेकर सरकारी योजनाओं में फर्जीवाड़े तक फैला हुआ है। जब कोई सरकारी कर्मचारी किसी उचित काम के लिए भी रिश्वत माँगता है, जब सरकारी ठेके योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि चंदे और सिफारिश के आधार पर मिलते हैं, जब न्यायिक प्रक्रिया को पैसे की ताकत से प्रभावित किया जाता है — तो ये सब भ्रष्टाचार के ही विविध रूप हैं।

भ्रष्टाचार की वैश्विक और राष्ट्रीय स्थिति : ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International) प्रतिवर्ष ‘भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक’ (Corruption Perceptions Index – CPI) जारी करती है जिसमें 180 देशों को उनके यहाँ भ्रष्टाचार की स्थिति के आधार पर स्थान दिया जाता है। वर्ष 2023 के सूचकांक में भारत 180 देशों में 93वें स्थान पर रहा और उसे 100 में से केवल 39 अंक मिले। यह स्थिति बताती है कि हम सुधार की दिशा में अभी काफी पीछे हैं। देश के भीतर कैग (CAG – Comptroller and Auditor General of India) की विभिन्न रिपोर्टें समय-समय पर सरकारी खर्चों में भारी अनियमितताओं का पर्दाफाश करती रही हैं। 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला आवंटन घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला — ये कुछ ऐसे मामले हैं जो हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक नुकसान से जुड़े रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2G मामले में खुद कहा था कि यह देश के संसाधनों की ‘राष्ट्रीय क्षति’ थी।
विकास पर भ्रष्टाचार का सीधा प्रभाव : विश्व बैंक के अनेक अध्ययनों में यह सिद्ध किया गया है कि भ्रष्टाचार और आर्थिक विकास के बीच एक उलटा संबंध है — जहाँ भ्रष्टाचार अधिक है, वहाँ दीर्घकालीन विकास दर कम रहती है। जब सरकारी परियोजनाओं की लागत भ्रष्टाचार के कारण बढ़ जाती है, तो सीमित राष्ट्रीय संसाधनों का बड़ा हिस्सा बेकार हो जाता है। इसका सीधा अर्थ है कि जितने स्कूल, अस्पताल, सड़कें और बाँध बनने चाहिए थे, वे नहीं बन पाते। नीति आयोग और विभिन्न संसदीय समितियों की रिपोर्टें यह दर्शाती रही हैं कि ग्रामीण विकास से जुड़ी कल्याण योजनाओं का बड़ा हिस्सा लक्षित लाभार्थियों तक नहीं पहुँचता। मनरेगा, पीडीएस, आवास योजनाओं में फर्जी लाभार्थियों की संख्या और ‘बिचौलियों’ की भूमिका चर्चा का विषय रही है। यानी गरीबों के लिए बनाई गई योजनाएँ उन तक पूरी तरह नहीं पहुँच पातीं।
बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार का असर साफ दिखता है। सड़कें बनने के कुछ महीनों में ही टूटने लगती हैं क्योंकि निर्माण में घटिया सामग्री का उपयोग होता है। भवन निर्माण में नियमों की अनदेखी होती है जिसके कारण इमारतें भूकंप या बाढ़ में ढह जाती हैं और जानमाल की भारी क्षति होती है। इन सबके पीछे वह भ्रष्ट तंत्र है जो नियमों की अनदेखी करने के लिए धन लेता है।

शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार : शिक्षा किसी भी राष्ट्र की नींव होती है। लेकिन जब शिक्षक नियुक्ति में घूस माँगी जाती है, जब परीक्षाओं में पेपर लीक होते हैं, जब डिग्रियाँ खरीदी और बेची जाती हैं — तो पूरी शैक्षिक व्यवस्था की साख गिर जाती है। उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों में समय-समय पर बड़े पैमाने पर पेपर लीक और फर्जी डिग्री के मामले सामने आते रहे हैं जिनकी जाँच सीबीआई तक पहुँची है। ऐसे में जो मेधावी छात्र ईमानदारी से पढ़ते हैं, उन्हें उनका उचित अवसर नहीं मिल पाता। स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार और भी घातक है क्योंकि यहाँ जीवन-मृत्यु का प्रश्न जुड़ा होता है। सरकारी अस्पतालों में दवाइयाँ बाहर से खरीदवाना, फर्जी दवा खरीद, घटिया उपकरणों की खरीद — ये समस्याएँ देश के कोने-कोने में दिखती हैं। COVID-19 महामारी के दौरान कई राज्यों में ऑक्सीजन सिलेंडर, रेमडेसिविर और पीपीई किट खरीद में अनियमितताओं की खबरें आईं, जो उस संकट के समय और भी अमानवीय थीं।
न्यायिक और प्रशासनिक तंत्र पर असर : लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका और प्रशासनिक व्यवस्था होती है। यदि इन दोनों में भ्रष्टाचार घर कर जाए तो पूरे तंत्र की नींव हिल जाती है। पुलिस में भ्रष्टाचार सबसे आम शिकायतों में से एक है। एफआईआर न दर्ज करना, जाँच को प्रभावित करना, आरोपियों को बचाना — ये समस्याएँ कमजोर और शक्तिहीन नागरिकों को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती हैं। प्रशासनिक स्तर पर भू-अभिलेख, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र जैसे रोजमर्रा के कामों में भी नागरिकों को अनावश्यक रूप से परेशान किया जाता है और उनसे अवैध धन वसूला जाता है। इससे जनता का सरकारी तंत्र पर से भरोसा उठने लगता है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बहुत खतरनाक है।
भ्रष्टाचार के सामाजिक और नैतिक दुष्प्रभाव : भ्रष्टाचार केवल आर्थिक नुकसान नहीं करता, यह समाज के नैतिक ताने-बाने को भी नष्ट करता है। जब कोई बच्चा देखता है कि बेईमानी से सफलता मिलती है, तो उसके मन में ईमानदारी के प्रति आस्था कमजोर होती है। जब समाज में यह संदेश जाता है कि ‘पैसे से सब कुछ होता है’, तो सामाजिक न्याय और समानता की अवधारणा खोखली पड़ जाती है। भ्रष्टाचार के कारण ही देश की प्रतिभाशाली युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा विदेश की ओर पलायन करता है। जब मेरिट के बजाय पैसे और सिफारिश से नौकरियाँ मिलती हैं, तो प्रतिभाशाली लोगों को अपने ही देश में उचित अवसर नहीं मिलते। इसे ‘ब्रेन ड्रेन’ कहते हैं और यह दीर्घकाल में राष्ट्र की सबसे बड़ी बौद्धिक हानि है।
भ्रष्टाचार विरोधी प्रयास और उनकी सीमाएँ : देश में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कई कानूनी और संस्थागत व्यवस्थाएँ हैं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (Prevention of Corruption Act), केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), लोकायुक्त संस्थाएँ, सीबीआई और ईडी — ये सब इस दिशा में काम करने के लिए बनाए गए हैं। जनवरी 2014 में दिल्ली में स्थापित और बाद में 2019 में पूरे देश में लागू हुए लोकपाल का गठन भी इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण कदम था। 2005 में लागू सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) ने आम नागरिकों को एक शक्तिशाली हथियार दिया। इसके जरिए जनता सरकारी कामकाज की जानकारी माँग सकती है जिससे पारदर्शिता बढ़ती है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरटीआई का उपयोग करके बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश किया है। हालाँकि यह भी दुखद है कि अनेक आरटीआई कार्यकर्ताओं को धमकियाँ मिली हैं और कुछ की जान भी गई है। डिजिटल इंडिया अभियान के तहत सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन करने से भी भ्रष्टाचार में कुछ हद तक कमी आई है। जब नागरिक घर बैठे पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, आय-जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं तो बिचौलिए की भूमिका कम होती है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से सब्सिडी सीधे लाभार्थी के खाते में भेजने से भी मध्यस्थों द्वारा होने वाले भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है। परंतु इन सभी प्रयासों की अपनी सीमाएँ हैं। भ्रष्टाचार से लड़ने वाली संस्थाएँ स्वयं यदि भ्रष्टाचार से मुक्त न हों, तो वे कारगर नहीं हो सकतीं। जाँच एजेंसियों की स्वायत्तता का प्रश्न हमेशा से विवाद का विषय रहा है। राजनीतिक संरक्षण में होने वाला भ्रष्टाचार सबसे कठिन चुनौती है क्योंकि उसे कानूनी जकड़न में लाना बेहद मुश्किल होता है।
समाधान की दिशा में विचार : भ्रष्टाचार एक बहुआयामी समस्या है इसलिए इसका समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए। सबसे पहली जरूरत है — शिक्षा में नैतिकता का समावेश। यदि बचपन से ही ईमानदारी, जवाबदेही और सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों को बच्चों में बोया जाए तो आने वाली पीढ़ी अधिक भ्रष्टाचार-मुक्त होगी। महात्मा गाँधी ने कहा था — ‘भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि आज आप क्या करते हैं।’ दूसरी आवश्यकता है — जाँच एजेंसियों की वास्तविक स्वायत्तता। यदि सीबीआई, ईडी और अन्य जाँच एजेंसियाँ राजनीतिक दबाव से पूरी तरह मुक्त हों और उन्हें संवैधानिक स्वायत्तता प्राप्त हो, तो वे निष्पक्ष जाँच कर सकेंगी। न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या को कम करना भी जरूरी है ताकि भ्रष्ट व्यक्ति को शीघ्र सजा मिले और ‘देरी से न्याय’ का लाभ नहीं उठाया जा सके। तीसरी दिशा है — चुनाव सुधार। चुनावों में काले धन का बोलबाला भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जड़ों में से एक है। जब नेता चुनाव जीतने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करते हैं तो सत्ता में आने के बाद उस पैसे की ‘भरपाई’ का दबाव भी बनता है। चुनाव खर्च की पारदर्शी निगरानी, राज्य-वित्त पोषित चुनाव और उम्मीदवारों की संपत्ति-घोषणा की सख्त जाँच — ये कदम जरूरी हैं। चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू है — नागरिक जागरूकता और सामाजिक दबाव। जब तक समाज यह स्वीकार करता रहेगा कि ‘यह तो यहाँ चलता है’ या ‘सब तरफ यही है’, तब तक भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी होती रहेंगी। जब नागरिक रिश्वत देने से इनकार करेंगे, शिकायत दर्ज कराने का साहस दिखाएँगे और भ्रष्ट लोगों को वोट देने से परहेज करेंगे — तभी असली बदलाव आएगा।
उपसंहार : भ्रष्टाचार देश के विकास में सबसे बड़ा बाधक इसलिए नहीं है कि यह केवल धन की बर्बादी करता है — बल्कि इसलिए कि यह उस विश्वास को तोड़ता है जिस पर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र टिका होता है। जब नागरिक अपनी सरकार पर, संस्थाओं पर और व्यवस्था पर से भरोसा खो देते हैं, तो विकास की कोई भी योजना अपना पूरा फल नहीं दे सकती। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार कहा था — ‘यदि एक देश भ्रष्टाचार-मुक्त होना चाहता है और सुंदर मनों का राष्ट्र बनना चाहता है, तो मुझे दृढ़ विश्वास है कि समाज में तीन प्रमुख सामाजिक सदस्य यह कर सकते हैं — पिता, माता और शिक्षक।’ यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। भ्रष्टाचार केवल कानून से नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण से मिटेगा। भारत की युवा पीढ़ी के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर है। एक ऐसा भारत बनाना जहाँ ‘सत्यमेव जयते’ केवल मुद्रा पर नहीं, बल्कि हर नागरिक के आचरण में उतरे — यही असली विकास होगा। और यह तभी संभव है जब हर व्यक्ति यह संकल्प ले कि न भ्रष्टाचार करूँगा, न करने दूँगा।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563