व्यंग्य – बाबाजी कहिन
एक बाबा जी के विचार सुनने को मिले। सचमुच उनको सुनकर दिल गदगद हो गया। वो आदमी और आदमी में भेद करते हैं। उनके अनुसार पूरे देश में एक समय ऐसा भी आएगा जब सब लोग शाकाहारी हो जाएँगें। कहीं माँस बिकता नजर नहीं आएगा। विचार तो ऐसे -ऐसे हैं उनके कि क्या कहने। दिल बलिहारी हुआ जाता है।
उनके अनुसार शूद्रों को सत्ता नहीं मिलनी चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो देश में अकाल पड़ने लगता है। बीमारियाँ पैदा होने लगतीं हैं। प्राकृतिक बदलाव होने लगता है। बेमौसम की बारिश आँधी-पानी चालू हो जाती है। भूकँप आता है। हैजा- प्लेग और टीबी जैसी बीमारियाँ पैदा होने लगातीं हैं।
मुझे उनकी बात पर हँसी आती है। बराका ओबामा उसी वर्ग में आते हैं। लेकिन उनके रहते देश ने बहुत तरक्की की। ऐसे अनगिनत लोग हुए हैं जो शूद्र होते हुए भी इतिहास रच गए। उनके पैरों के धूल के बराबर भी नहीं हैं ,ऐसे स्वयंसिद्ध बाबा।
बकौल बाबा के शूद्रों के कारण ही नालियाँ दुर्गंध देतीं हैं। तमाम तरह के कीड़ों के जन्मदाता भी शूद्र ही हैं। वो शूद्र जो इनके लिए खेती करते हैं। जो इनके कपड़े धोते हैं। वो शूद्र जो इनकी बागवानी करते हैं। वे शूद्र जो इनके जानवर और ढ़ोर -डाँगर चराते हैं। वो शूद्र जो इनके लिए उपले बनाते हैं। वो शूद्र जो खेतों में पानी डालते हैं। वो शूद्र जो रातों को इनके खेतों की रखवाली करतें हैं। इनके लिए फसल उगाते हैं। ऐसे लोग जमीन पर रेंगने वाले कीड़े हैं।
जो बाबा हैं वो खुद ही मोहमाया में फँसे हुए हैं। बकौल बाबा सन् दो हजार सोलह में उन्होनें मुखिया का चुनाव लड़ा था। लेकिन वो मुखिया का चुनाव हार गए थे।
वो बाबा हैं और स्वयंसिद्ध बाबा हैं। और उनसे बड़ा बाबा ना तो इस समय कोई है। और ना ही होगा। ऐसा वो दावा करते हैं। उनके अनुसार वो देश के मुखिया के गुरू हैं।
बाबाजी खुद माया में फँसे हुए हैं। और माया के बिना इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऐसा तर्क देते हैं। उनके अनुसार सूर्य, चँद्रमा और पृथ्वी भी माया के कारण ही अपनी-अपनी जगह पर टिके हैं। तब गुरूत्वाकर्षण के नियम को वो ताखे पर रख देते हैं। उनके अनुसार भेदभाव का होना बहुत जरूरी है। सभी वर्णों को अपने -अपने काम करते रहना चाहिए। शूद्र केवल और केवल सेवा करने के लिए ही पैदा हुए हैँ। शूद्रों को सत्ता नहीं सौंपनी चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था को वो बेकार मानते हैं। संविधान आधारित व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही समाजिक व्यवस्था चलनी चाहिए। उनके विचार बहुत महान् हैँ। और बाबाजी तो और भी महान् हैं।
— महेश कुमार केशरी
