वर्तमान भूत का द्वंद्व
किसी के भी पास अंदर चल रहे द्वंद्व का उपचार नहीं है। लोग आते हैं, कई बातें करते हैं, अपने नजरिये से समझते हैं और उनके अनुसार समझाते हैं पर ऐसा बहुत ही कम मिलेगा कि कोई आपके नज़रिए से चीज़ें समझे और तब जाकर आपको समझाए। कहीं न कहीं हर व्यक्ति दोहरी जिंदगी जी रहा है, एक वह जो उसका वर्तमान है और एक जो उसका अतीत है। कुछ लोग भविष्य को लेकर भी चिंतित रहते हैं लेकिन वह चिंता होती है वह भविष्य जी नहीं रहे होते हैं। सब कुछ स्मृतिओं के आधार पर जिंदा रहता है। स्मृतियाँ उतनी ही जीवंत है जितना कि प्राणवायु से मानव शरीर। अतीत से परेशान होते हैं तो वर्तमान में कोई रास्ता निकलते हैं और वही वर्तमान अतीत के अपेक्षाकृत उम्मीदें पूरी न करे तो कल को वही अतीत सुखद एहसास की स्मृतियाँ लेकर आ जाता है। मगर अतीत अगर उम्मीदें पूरी न करे तो वही फांस बनकर रह जाता है। न वो वर्तमान को जीने देता है और न भविष्य को समझ सकता है। कुछ अतीत ऐसे भी हैं जिनमें हर रंग था लेकिन फिर उनका रंग खत्म हो गया, या यूं भी कह सकते है कि उसका रंगीन होना मात्र छलावा था जो आज आपकी जिंदगी को रोककर बैठा हुआ है। रुकी जिंदगी बिखरी जिंदगी से कहीं ज्यादा खराब होती है क्योंकि बिखरी हुई में पता होता है कि क्या टूट चुका है उससे ही उभर रहे होते इंसान को पता होता है कि सब खत्म हो चुका है, वो मृत्यु की दहलीज पर ही होता है पर मृत्यु भी उसके वश में नहीं होती है, कुछ समय बाद जब सोचने समझने की अवस्था में आता है तब उसको पता चलता है कि जीवन जीना होगा क्योंकि तुमसे भी किसी को उम्मीदें है, तुम्हारी उम्मीदें तोड़कर कोई चला गया पर अगर तुमने भी वही किया तो तुममें और उसमें, सच में और छलावे में, समंदर में और दलदल में क्या अंतर रह जायेगा। उसके बाद उसका जीवन और कठिन हो जाता है, या ये मानो कि अग्नि परीक्षा की समाप्ति हो चुकी होती है और एक नई परीक्षा इंतजार कर रही होती है ये वो परीक्षा है जिसमें मृत्यु का विकल्प सबसे बाद में है, किसी ने सच ही कहा है, असल मृत्यु के आने से पहले इंसान कई मौतें पहले ही मर चुका होता है, उसकी किस्मत, बेरंग और खाली जिंदगी उसको पल पल मार रही होती है। बस शोक उसका असल वाली पर ही मनाया जाता है, बाकी मृत्यु गुमनाम होती हैं। इसके हिसाब से असल समय आने पर मृत्यु भय ही खत्म हो जाता है। क्योंकि इसमें कम से कम उसको एहसास नहीं होता कि वो मर चुका है।
— सौम्या अग्रवाल
