कविता

सहला गई मुझे

तुम्हारा परोक्ष रुप से
मेरे सामने होना
या न होना
यूं तो दिल को सब पता था
बस एक ख्याल जो साथ रहा करती

मन का मान जाना
कभी-कभी सामान्य सी
बात लगती है
परंतु जब मैं विचलित हो
पागलों सा कुछ ढूँढती हूँ तो
महसूस होता है कि
तुम्हें मेरे साथ होना चाहिए

गुनगुनी धूप में
बैठकर गीले बालों को
धीरे-धीरे उँगलियों के पोर से
सुलझाना ,खूद से बातें करना
किस दुनिया में लिए जा रही थी

कभी-कभार उंगलियों से
बालों के लट को गोल-गोल
घुमाते हुए,लपेटते हुए
तुमको ही सोंचना
सुखद सा था

हल्की सी सर्द हवा
बदन को छूकर गुजर रही थी
आस-पास खिले जंगली फूलों की
मादक गंध और
उसपर उड़ती तितलियाँ
मन को मोह लिया करती

तभी एक फूल के गुच्छे को
तोड़ लाने की इच्छा हुई
बालों के जूड़े में फूल सुंदर लगते हैं
कभी तुमने मुझसे कहा था
ये सहसा ही याद आ गई
और मैं न जाने क्यूँ शरमा गई

कुछ पल में ही
कुछ तितलियां मेरे इर्द-गिर्द
घुमती हुई पंख हिलाती
मेरे गालों को सहला जाती
तुम इसी तरह मेरे पास रहते हो

— सपना चन्द्रा

*सपना चन्द्रा

जन्मतिथि--13 मार्च योग्यता--पर्यटन मे स्नातक रुचि--पठन-पाठन,लेखन पता-श्यामपुर रोड,कहलगाँव भागलपुर, बिहार - 813203