कविता

आज की नारी

शक्ति का है प्रतीक और भावनाओं की गंगा,
ईश ने नारी को कई अनोखें किरदारों में रंगा,
बनी वो कभी बेटी, बहन, बहु, पत्नी और मॉं,
“आनंद” के गीत से बॉंधा उसने हर एक समां ।

पहचानती है वो आज अपना हर एक अधिकार,
नहीं करती है अब वो किसी उत्पीड़न को स्वीकार,
आज की नारी है सबला और ताकतवर नई नवेली,
भीड़ गई जो ज़ोरदार मुश्किल से धुआंधार अकेली ।

खुद पर करती है वो दूसरों से कहीं ज़्यादा विश्वास,
कंधे से कंधा मिलाकर रचती है जो नया इतिहास,
समाज की बेडि़यों कि नहीं करती वो अब परवाह,
अपने दमखम पर दिया है उसने सपनों को प्रवाह ।

रिश्तों की गरिमा को वो सुंदरतम बनाएं रखती,
पर रूढ़िवादिता के बोझ को वो अब नहीं सहती,
त्याग, तपस्या ममत्व का बसा उसमें अनंत भंडार,
मुस्कुराहट रख संग संभालती वो घर बाहर परिवार ।

अन्याय के खिलाफ़ वो लड़ती है जबरदस्त जंग,
देख उसके स्वाभिमान, शौर्य को हर कोई हैं दंग,
आज की तेजस्विनी नारी का करता है विश्व सम्मान,
काबिलियत से अपनी नापा उसने जमीं आसमान ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु