किरदार और वास्तविकता
मैं देख रहा हूं कि
बच्चे खेल रहे हैं
होकर मस्ती में चूर,
गम और चिंताओं से दूर,
खेल जीवन का एक प्रयोग,
शरीर के हलचल के लिए उपयोग,
खाली समय वो बैठकर कैसे रहे,
छल प्रपंच कपट से मतलब नहीं
बड़ों की तरह ऐंठकर कैसे रहे,
पढ़ाई के बीच थोड़ा समय मिलते ही
वो ले आते हैं नए गेम
रच लेते हैं अपना एक नया किरदार,
ढल जाते हैं अपने पात्र में,
और निभा लेते हैं
भविष्य में निभाए जाने वाले अवतार,
बिल्कुल नए और अलग रंग से
फिर से निकल आते हैं
वही किसी कक्षा का छात्र बनकर,
लग जाते हैं पढ़ाई में पुनः डटकर,
पालकों का मस्तिष्क पर डाला गया बोझ
उठाए हुए,
शिक्षा के बजाय कैरियर में नजर गड़ाए हुए।
— राजेन्द्र लाहिरी
