कविता

कविता

लहूलुहान धरा हुई,
कालिमा नभ में छाई,
चिथड़े उर झकझोरती,
मानवता है कराहती।

दंभ की इस आग में,
अहंकार अरु जोश में,
होश खो रहा मानवी,
त्रास दे मति दानवी।।

युद्ध से खंडहर हुए,
निर्मिती के अवशेष रहें,
धुँआ-धुँआ हुई जिंदगी,
दर्प की फैली गंदगी।।

जिद किसी की चैन लूटे,
सत्ता भूख से सपने टूटे,
बमबारी भयभीत करें,
बरबादी का अरमान भरें।।

रोकना होगा जंग को,
मानवता हित दंग को।।
शांति की हो सद्भावना।
सुकून की शुभ कामना।।

— चंचल जैन

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८