नारी घर की शान
नारी गौरव-संस्कृति की अमर धरोहर,
शक्ति-स्नेह, समर्पण-स्वाभिमान से भरपूर,
संस्कृति की शान, उससे ही जग में सम्मान,
ममता की गंगा नारी, अभिमान से रहती दूर
नारी घर की शान है, सृष्टि दिव्य आधार,
उस से ही है चहकता, अद्भुत ये सारा संसार,
महिला घर की शान है, नर उसका अभिमान,
दोनों से मिल कर बना, सारा जगत महान।
विहंगम दृष्टि से देख जगत को चेतन नारी,
सजग-सशक्त हुई, पहचान न अपनी भूली है,
नाच चुकी फिरकी-सम अब तक कितना ही,
अब सुदृढ़ संकल्प ले निज मंजिल चुन ली है।
तोड़के रक्तरंजित बेड़ियां हाथों में अब लाठी ली,
संकल्पों की ज्वाला से जो अपने लक्ष्यों को पाए,
नहीं रुकेगी आज की नारी आगे कदम बढ़ाएगी,
नहीं रही वह अब बेचारी कांटों में भी फूल खिलाए।
— लीला तिवानी
