बाल कविता

पानी का खेल

आँगन में छप-छप पानी आया,
हाथों में जब पाइप थमाया।
छप-छप करके पानी बहता,
मेरा मन भी संग-संग रहता।

लाल-सी मेरी गाड़ी खड़ी,
हँसती जैसे कोई गुड़िया बड़ी।
पानी की बूंदें उस पर जाएँ,
गाड़ी भी जैसे नहाकर आए।

छप-छप, छप-छप, खेल निराला,
बचपन का ये रंग है प्यारा।
भीग गए कपड़े, भीगा मन,
हँसी उड़ी जैसे नन्हा गगन।

मम्मी बोली — बस अब आओ,
इतना पानी मत बहाओ।
मैं बोला — बस थोड़ी देर,
बना रहा हूँ बारिश का ढेर।

पाइप पकड़े छोटा हाथ,
चल पड़ा पानी के साथ।
छप-छप करती ठंडी धार,
खेल बना ये बड़ा मज़ेदार।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh