झाड़ू बेचने वाला
सुबह की पहली किरण के संग,
कंधे पर उम्मीदों का बोझ लिए,
निकल पड़ता है वह चुपचाप
गली-गली में अपना रोज़ लिए।
“झाड़ू ले लो… झाड़ू!” की ध्वनि
सन्नाटे को चीरकर जाती है,
हर दरवाज़े पर उसकी आशा
धीरे से दस्तक देकर आती है।
कभी कोई दाम कम कर देता,
कभी कोई यूँ ही टाल देता,
पर वह मुस्कुराकर आगे बढ़ता,
दिल का दर्द भी संभाल लेता।
उसकी झाड़ू सिर्फ कूड़ा नहीं,
घर-आँगन की धूल हटाती है,
कौन समझे उस कमज़ोर की
ज़िंदगी कितनी झाड़ू लगाती।
शाम को जब थका-हारा लौटे,
थैली में थोड़े से होते हैं रूपये
अपने बच्चों की हँसी देखकर
उसके सारे दुख होते हैं छोटे।
वह जानता और समझता है
कल फिर सुबह सूरज निकलेगा,
और वह फिर गलियों में जाएगा,
“झाड़ू ले लो…झाड़ू” पुकारेगा,
और उम्मीदों से अपना घर,
रोशन करने का ख़्वाब सजाएगा।
— संजय एम तराणेकर
