ग़ज़ल
थका नहीं हूं अभी ये उड़ान बाकी है
लगता है और नया इम्तहान बाकी है
परों में जान है डरता नहीं ऊंचाई से
मुझे पता है अभी आसमान बाकी है
इन अंधेरों से नहीं डर ये है फितरत मेरी
अभी भी दिल के उजालों की आन बाकी है
बहुत गजब है यह दुनिया हमेशा बोले हैं
भुला दिया है पर तेरा गुमान बाकी है
यह कचहरी का चलन राज लाल फीते का
रोज तू दौड अगर तुझ में जान बाकी है
खत्म हो जाएगा जल्दी ही उजालों का सफर
अंधेरा बोलेगा अब भी बयान बाकी है
कभी जुडता ही नहीं वक्त का टूटा शीशा
लाख दुनिया ये कहे इसकी शान बाकी है
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
