कविता

नन्हा साइकिल सवार

मेरी छोटी साइकिल आई,
टुन-टुन करती घंटी लाई।
साथ खड़ा मेरा एक यार,
कहता चलो लगाएँ रफ़्तार।

टुन-टुन करती घंटी बोले,
चलो घूमें आज मैदान।
धीरे-धीरे पैडल घूमें,
हवा करे उसका सम्मान।

लाल कुर्ते में नन्हा राजा,
आँखों में सपनों की धार।
कभी रुके तो टोकरी देखे,
कभी चल दे फिर तैयार।

साथ खड़ा उसका एक साथी,
मुस्काकर देता उसे पुकार—
“चल जल्दी से दौड़ लगाएँ,
देखें कौन बने सरदार!”

हँसी-खुशी में खेलते बच्चे,
धूप भी लगती जैसे प्यार।
ऐसे ही बीते बचपन सारा,
साइकिल, दोस्ती और संसार।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh