सामाजिक

विकलांग समाज

अगर सच्चाई से भागते रहेंगे तो हालात कभी नहीं बदलेंगे। भारत में करोड़ों विकलांग लोग रहते हैं। यह कोई छोटा समाज नहीं है, बल्कि इतनी बड़ी आबादी है कि अगर सच में एकजुट हो जाए तो देश की राजनीति की दिशा बदल सकती है। लेकिन दुख की बात यह है कि इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद विकलांग समाज आज भी अधिकारों की लड़ाई में कमजोर दिखाई देता है। और यह सिर्फ सरकारों की गलती नहीं है। इसमें हमारी अपनी गलतियाँ भी उतनी ही बड़ी हैं।
सच्चाई नंबर एक — विकलांग समाज बिखरा हुआ समाज है। छोटे-छोटे संगठन, अलग-अलग मंच, अलग-अलग नेता, अलग-अलग एजेंडा। लेकिन जब पूरे समाज के अधिकारों की बात आती है तो एकजुटता दिखाई नहीं देती।
सच्चाई नंबर दो — विकलांग समाज के अंदर धड़ेबाज़ी बहुत है। कहीं अहंकार की लड़ाई, कहीं नेतृत्व की लड़ाई, कहीं पहचान की लड़ाई। और जब समाज अंदर से ही बंटा हुआ हो तो बाहरी ताकतों को उसे कमजोर करने के लिए कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
सच्चाई नंबर तीन— राजनीति में कमजोर समाज को हमेशा नजरअंदाज किया जाता है। राजनीति भावनाओं से नहीं चलती, राजनीति ताकत से चलती है। और ताकत दो चीज़ों से बनती है — संख्या और संगठन। विकलांग समाज के पास संख्या तो है, लेकिन संगठन की ताकत अभी भी कमजोर है।
यही वजह है कि सरकारें मंचों पर बड़े-बड़े भाषण तो देती हैं, लेकिन असली बदलाव की रफ्तार बहुत धीमी रहती है। देश में विकलांग लोगों के अधिकारों के लिए Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 बनाया गया था। कानून में बराबरी की बात है। रोजगार की बात है। शिक्षा की बात है। सम्मान की बात है। लेकिन जरा जमीन की हकीकत देखिए — कितने सरकारी दफ्तर वास्तव में विकलांग-अनुकूल हैं? कितने सरकारी विभागों में विकलांगों का आरक्षण पूरी तरह भरा गया है?
कितने शहर ऐसे हैं जहाँ एक व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति बिना संघर्ष के घूम सके?
अगर ईमानदारी से जवाब दिया जाए तो पता चल जाएगा कि कागज और जमीन के बीच कितना बड़ा फर्क है।
लेकिन सवाल यह भी है — क्या इस स्थिति को बदलने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारों की है? या विकलांग समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी? इतिहास गवाह है। दुनिया में किसी भी समाज को उसके अधिकार दया से नहीं मिले। अधिकार हमेशा संघर्ष से मिले, संगठन से मिले, और राजनीतिक ताकत से मिले। जब कोई समाज अपनी ताकत पहचान लेता है तो हालात बदलने लगते हैं। लेकिन जब वही समाज आपसी झगड़ों, धड़ों और छोटे-छोटे अहंकारों में उलझ जाता है तो उसकी आवाज़ कमजोर पड़ जाती है।
विकलांग समाज को आज खुद से एक सवाल पूछना होगा — क्या हम हमेशा छोटे-छोटे समूहों में बंटे रहेंगे? क्या हम हमेशा एक-दूसरे को गिराने में लगे रहेंगे? क्या हम हमेशा इस इंतजार में रहेंगे कि कोई और आकर हमारी लड़ाई लड़े? अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर रास्ता भी साफ है। धड़ेबाज़ी छोड़नी होगी।
छोटी सोच छोड़नी होगी। व्यक्तिगत अहंकार छोड़ना होगा। और एक साझा मंच बनाना होगा। जहाँ कोई बड़ा-छोटा नहीं होगा, कोई संगठन छोटा-बड़ा नहीं होगा, सिर्फ एक पहचान होगी — विकलांग समाज।
जिस दिन करोड़ों की संख्या वाला विकलांग समाज सच में एकजुट होकर खड़ा हो गया, उस दिन राजनीति को भी अपना रवैया बदलना पड़ेगा। क्योंकि लोकतंत्र में वही समाज आगे बढ़ता है जो अपनी ताकत पहचान लेता है। और अगर विकलांग समाज आज भी नहीं जागा, अगर आज भी धड़ेबाज़ी चलती रही,
अगर आज भी लोग एक-दूसरे को कमजोर करते रहे — तो आने वाले वर्षों में भी वही कहानी दोहराई जाएगी — कुछ वादे, कुछ भाषण, कुछ घोषणाएँ… और अधूरे अधिकार।
लेकिन अगर आज यह समाज जाग गया, अगर आज यह समाज एक हो गया, अगर आज यह समाज अपने अधिकारों के लिए खड़ा हो गया — तो आने वाली पीढ़ियाँ इस समय को विकलांग समाज के जागरण का समय कहेंगी।
याद रखिए — इतिहास उन समाजों को याद रखता है जो एकजुट होकर अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं।
अब फैसला विकलांग समाज को करना है — बिखरे रहना है या इतिहास बदलना है।
— हेमंत सिंह कुशवाह
उपप्रधान विकलांग बल

हेमंत सिंह कुशवाह

राज्य प्रभारी मध्यप्रदेश विकलांग बल मोबा. 9074481685