कविता

जाने की जल्दी

फर्राटे भरती कार, बाइक, ट्रक,
हर ओर बिखरी है आपाधापी,
होड़ है आगे निकल जाने की,
आगे वालों को भी पछाड़ आने की।

जिंदगी बन गई है महज़ रफ्तार,
चाहे शांत कछुआ हो,
या फुर्तीला चीता,
या चालाक सियार।

संभलो—
ज़रा ठहरो,
एक पल ब्रेक लगाओ,
सुरक्षित आओ, सुरक्षित जाओ।

क्या पता यह जाने की जल्दी
तुम्हें कहीं दूर ले जाए,
इतना दूर—
जहाँ से लौटने की कोई राह न आए।

यह दौड़ किसे दिखानी है?
किसे हराने की ठानी है?
हिरण-सी दौड़ में
कौन-सी कस्तूरी पाना है?
और इस अकड़े हुए अहंकार से
आख़िर किसे झुकाना है?

कहते हो—
जिंदगी कम पड़ जाती है जीने को,
फिर क्यों अनदेखा करते हो
इन धड़कनों, इन जख्मों को सीने में सीने को?

भाई,
जीवित रहोगे—
तो हर मंज़िल पा जाओगे,
पर अगर रफ्तार को ही चुन लिया,
तो रास्ते ही तुम्हें निगल जाएंगे।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554