छात्रों द्वारा एआई टूल्स का उपयोग: रचनात्मकता का विस्तार या नकल की संस्कृति?
ज्ञान के गगन में जब नवाचार की नयी नक्षत्र-रेखा निखरती है, तब शिक्षा का स्वरूप भी समय के साथ संवरता और संकल्पित होता है। आज के डिजिटल दौर में कृत्रिम मेधा, जिसे सामान्यतः एआई कहा जाता है, विद्यार्थियों के अध्ययन-अभ्यास का अभिन्न अंग बनती जा रही है। यह तकनीक केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि सीखने की शैली, सोचने की संरचना और सृजन की सीमा को पुनर्परिभाषित करने वाली शक्ति बन चुकी है। परंतु इस परिवर्तन के साथ एक प्रश्न निरंतर प्रतिध्वनित हो रहा है कि क्या एआई विद्यार्थियों की रचनात्मकता को विस्तार दे रहा है या यह अनजाने में नकल की नई संस्कृति को जन्म दे रहा है। इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि इसमें संभावनाओं की प्रभा और समस्याओं की परछाई दोनों सम्मिलित हैं।
यदि हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो वर्ष 2023 में यूनेस्को द्वारा प्रकाशित “एजुकेशन इन अ वर्ल्ड ऑफ एआई” नामक मार्गदर्शिका में स्पष्ट रूप से यह कहा गया कि एआई शिक्षण और अधिगम को अधिक व्यक्तिगत, लचीला और सुलभ बना सकता है, किंतु इसके साथ नैतिकता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की स्पष्ट रूपरेखा अनिवार्य है। इसी प्रकार आर्थिक सहयोग और विकास संगठन, जिसे ओईसीडी कहा जाता है, की वर्ष 2021 की “एआई इन एजुकेशन” रिपोर्ट में यह उल्लेखित है कि एआई आधारित उपकरण विद्यार्थियों को जटिल अवधारणाओं को समझने, विश्लेषण करने और नवीन विचार उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि एआई का प्रयोग यदि संतुलित और संयमित हो, तो यह शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है।
भारत के संदर्भ में भी यह प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है। वर्ष 2022 में अखिल भारतीय उच्चतर शिक्षा सर्वेक्षण, जिसे एआईएसएचई कहा जाता है, के आँकड़ों के अनुसार देश में 4 करोड़ से अधिक विद्यार्थी उच्च शिक्षा में नामांकित हैं। इन विद्यार्थियों के बीच डिजिटल संसाधनों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। नीति आयोग द्वारा वर्ष 2021 में प्रकाशित “राष्ट्रीय कृत्रिम मेधा रणनीति” में यह स्पष्ट किया गया कि शिक्षा क्षेत्र में एआई का उपयोग शिक्षण को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाने के लिए किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की विभिन्न पहलें, जैसे डिजिटल शिक्षा मंच और आभासी प्रयोगशालाएँ, यह दर्शाती हैं कि एआई आधारित उपकरणों को शिक्षा प्रणाली में समाहित करने का प्रयास लगातार जारी है।
इस पृष्ठभूमि में यदि हम विद्यार्थियों द्वारा एआई टूल्स के उपयोग को देखें, तो इसका एक उज्ज्वल पक्ष स्पष्ट रूप से सामने आता है। एआई आधारित लेखन सहायक, भाषा अनुवाद उपकरण और वैयक्तिक शिक्षण मंच विद्यार्थियों को अपनी समझ को गहराई देने और अपनी अभिव्यक्ति को सशक्त बनाने का अवसर प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, किसी जटिल विषय को समझने में एआई त्वरित और सरल व्याख्या प्रस्तुत कर सकता है, जिससे विद्यार्थी अपनी गति और क्षमता के अनुसार सीख सकते हैं। यह प्रक्रिया सीखने को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाती है, जहाँ ज्ञान केवल कुछ सीमित संसाधनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक रूप से उपलब्ध हो जाता है।
परंतु इसी प्रकाश के साथ एक छाया भी चलती है। एआई टूल्स का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर अध्ययन के स्थान पर निर्भरता की दिशा में ले जा सकता है। वर्ष 2023 में प्रकाशित एक सर्वेक्षण, जिसे अमेरिका की स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की मानव-केंद्रित एआई रिपोर्ट में उद्धृत किया गया, यह संकेत देता है कि विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग एआई आधारित उपकरणों का उपयोग असाइनमेंट और लेखन कार्यों में कर रहा है। यद्यपि यह उपयोग हमेशा अनुचित नहीं होता, परंतु जब यह मौलिक विचारों के स्थान पर सीधे उत्तर प्राप्त करने का माध्यम बन जाता है, तब यह नकल की संस्कृति को प्रोत्साहित कर सकता है।
नकल की यह संस्कृति केवल नैतिक समस्या नहीं है, बल्कि यह शिक्षा के मूल उद्देश्य को भी प्रभावित करती है। शिक्षा का लक्ष्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि विचार करना, विश्लेषण करना और नवाचार करना है। यदि विद्यार्थी एआई पर अत्यधिक निर्भर हो जाते हैं, तो उनकी आलोचनात्मक सोच और रचनात्मक क्षमता का विकास बाधित हो सकता है। यूनेस्को की 2023 की रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि एआई के उपयोग में पारदर्शिता और नैतिकता का अभाव शिक्षा में असमानता और अनुचित लाभ की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।
इस संदर्भ में शिक्षकों और संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि एआई को एक सहायक उपकरण के रूप में उपयोग किया जाए, तो यह विद्यार्थियों की रचनात्मकता को कई गुना बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए, एआई के माध्यम से विद्यार्थी अपने विचारों को संरचित कर सकते हैं, भाषा को सुधार सकते हैं और नए दृष्टिकोण विकसित कर सकते हैं। परंतु इसके लिए यह आवश्यक है कि शिक्षण पद्धति में भी परिवर्तन किया जाए। केवल पारंपरिक परीक्षा और असाइनमेंट आधारित मूल्यांकन के स्थान पर परियोजना आधारित और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों को स्वयं सोचने और सृजन करने के लिए प्रेरित किया जा सके।
इसके साथ ही, डिजिटल साक्षरता और नैतिक शिक्षा को भी पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना आवश्यक है। विद्यार्थियों को यह समझाना होगा कि एआई का उपयोग कैसे किया जाए, कहाँ तक किया जाए और किन परिस्थितियों में इसका उपयोग अनुचित माना जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि नैतिक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। इस नीति के अनुरूप यदि एआई के उपयोग को संतुलित और नियंत्रित किया जाए, तो यह विद्यार्थियों के समग्र विकास में सहायक हो सकता है।
अंततः यह प्रश्न कि एआई रचनात्मकता का विस्तार कर रहा है या नकल की संस्कृति को जन्म दे रहा है, इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि हम इस तकनीक का उपयोग किस प्रकार करते हैं। यदि एआई को एक उपकरण के रूप में, एक सहयोगी के रूप में और एक सहायक के रूप में उपयोग किया जाए, तो यह ज्ञान के नए द्वार खोल सकता है और विद्यार्थियों की सृजनात्मकता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है। परंतु यदि इसे एक शॉर्टकट के रूप में, एक प्रतिस्थापन के रूप में और एक निर्भरता के रूप में अपनाया जाए, तो यह शिक्षा की आत्मा को आहत कर सकता है।
समय का संदेश स्पष्ट है कि तकनीक का तटस्थ होना संभव नहीं, उसका प्रभाव उसके उपयोग पर निर्भर करता है। इसलिए आवश्यक है कि हम एआई को विवेक, मूल्य और मर्यादा के साथ अपनाएँ। जब विद्यार्थी अपने विचारों की वीणा को एआई के स्वर से संयोजित करेंगे, तब सृजन का संगीत और भी मधुर होगा। परंतु यदि यह संयम टूटता है, तो वही संगीत शोर में परिवर्तित हो सकता है। अतः संतुलन, समझ और सतर्कता ही वह सूत्र है, जो एआई के इस युग में शिक्षा को सशक्त, सार्थक और संस्कारित बना सकता है।
— डॉ. शैलेश शुक्ला
